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झिझिरकोना-झिझिरकोना कोन कोना जाउ

jhijhirkona jhijhirkona kon kona jau

श्याम दरिहरे

श्याम दरिहरे

झिझिरकोना-झिझिरकोना कोन कोना जाउ

श्याम दरिहरे

और अधिकश्याम दरिहरे

    कतेको ढाकी बात कहल गेल अछि

    हमरा दुखक मादे।

    हमर यंत्रणासँ भरल अछि

    मोटाक मोटा किताब

    ढेउर देल गेल अछि हमर वेदना

    कतेको देशक देवालपर।

    मुदा तैओ कहाँ भेटल हमरा

    हमर दुखक कोनो ओर।

    पेटे तकाकऽ मारैए लात

    तों जीहे लैत छह सट्ट दऽ घीचि

    ललका कपड़ा बान्हल

    पोथीक देखाकऽ डर

    पसारलक खाँटी पाखंड

    तों ललका झंडा लेने छह गछाड़ि

    बीच-बीचमे चोभऽ लेल रहइ छह दैत

    नव-नव नाराक लमनचूस।

    घरवालीकेँ लऽ जाइत छल हवेली

    तों रहरहाँ लऽ पड़ाइत छह

    पलामूक जंगलमे बिआहुत बेटी

    हमरा लग तँ टीसक अछि सवाल

    से दिअए ओकर गुलेंती

    की दिअए चीनक चक्कू।

    सबहक छै अपन-अपन औजार

    केओ पिबह कतबो डूबिकऽ पानि

    हम तँ बुझिते छी

    हम तँ जनिते छी—

    सभक जीहपर लागल खून

    हमरे देहक अछि।

    बुझि गेलहुँ हम सबहक

    झिझिरकोना-झिझिरकोना बाउ

    एकबेर आर ताकय पड़त हमरा

    आब कोन कोना हम जाउ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : क्षमा करब हे महाकवि [मैथिली कविता-संग्रह] (पृष्ठ 80)
    • रचनाकार : श्याम दरिहरे
    • प्रकाशन : नवारंभ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2016

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