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जब पिता मरते हैं

jab pita marte hain

आशीष गौड़

आशीष गौड़

जब पिता मरते हैं

आशीष गौड़

और अधिकआशीष गौड़

    मृत्यु के बाद का शरीर

    मरने से पहले के व्यक्ति-सा नहीं रहता।

    मृत के क़रीब बैठा मैं

    पर्वत-सा दृढ़, ठंडा और स्थिर व्यक्ति देखता रहा।

    उसे देख मुझे रोना नहीं आया,

    उसकी बातें सोच मुझे रोना आया।

    पूरा शरीर पानी छोड़ रहा था,

    और दोनों अंगूठे एक-दूसरे से चिपके बाँधे थे।

    मुझे वह देख पाता, तो मैं फफक जाता,

    आँखों को सूखी पलकों ने बंद कर लिया था।

    वेदना, क्रंदन और व्यथा से भरे स्वर उसे जगा पाएँ,

    उसके दोनों कान कपास से भरे थे।

    सारे कपड़े काट उसे भभूति से लेप दिया गया,

    एक पटुए की बनी रस्सी से

    उसके प्राण एक माटी की हाँडी में स्थानांतरित कर दिए।

    अब शायद हाँडी ही काया का अभिरूप थी।

    आख़िर बार देख भी मुझे रोना नहीं रहा था।

    आस-पास के मृत शरीरों से घिरे शवदाहगृह में

    पर्ची जमा कर स्लॉट बुकिंग कराने चला गया।

    उसकी छाती पर एक जलता कोयला रखा गया,

    और मुँह में चावल डाल दिए गए।

    फिर एक ट्रे से उसे भट्टी में जला दिया।

    कितना होता होगा तापमान अंदर?

    अरे, 1100 डिग्री सेल्सियस—

    शुक्र ग्रह से भी ज़्यादा गर्मी है अंदर।

    बस अब एक बुध ग्रह और सूर्यमंडल तक की यात्रा

    दो घंटे में हो जाएगी।

    मुझे अस्थि चुगने दो घंटे में आना था।

    मरने के बाद मृत कहाँ जाता है,

    यह कोई नहीं जानता।

    वह रहता है दीवार पर लटकी फ़ोटो में

    और स्मरण में।

    मैं कश्ती से घर गया,

    और वह दरिया लिए चला गया।

    निर्जीव वस्तुएँ पड़ी रहती हैं घर में,

    कोने पकड़कर मौजूद रहती हैं

    आपके जीवन में।

    पिता एक ही होता है—

    जो पड़ा है निर्जीव वस्त्र-सा,

    निर्जीव ज़मीन-सा।

    वस्त्र, विचारहीन ज़मीन, ठंडी हवा-सी।

    मुझे आदत नहीं निर्जीवता या विचार-विमर्श की।

    मेरी समझ जीवित से प्रलोभन की ही है।

    तो क्या करता है कोई जब पिता मर जाते हैं?

    रोते हैं, याद करते हैं—

    यह तो सब कर रहे हैं।

    मैं पिता होना चाहता हूँ।

    उन्हीं पगडंडियों पर चलना है मुझे।

    पर निर्जीव नहीं रहना।

    तो कैसे वापस बुलाकर पूछ पाऊँ

    कि कैसे चलना होता है—

    जब सब विपरीत होता है।

    मुझे तस्वीरें लेना पसंद है।

    उन तस्वीरों में पिता को निर्जीव देखना पसंद नहीं।

    मैंने ली उनकी एक तस्वीर

    जो निर्जीवता से पहले की है,

    और आज की भी।

    दोनों में कुछ फ़र्क़ नहीं अब।

    याद बस अलग है।

    मुझे यादें नहीं,

    मुझे पिता चाहिए।

    वे सभी, जिन्होंने पिता खोए हैं,

    मेरी संवेदना है उनसे।

    ईर्ष्या क्यों उनसे

    जिन्हें नसीब है उनका साया।

    मुझे ईर्ष्या पसंद नहीं,

    मुझे पिता पसंद हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : आशीष गौड़
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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