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जब आती है तेरी याद

jab aati hai teri yaad

कृष्ण चंद्र मिश्रा

कृष्ण चंद्र मिश्रा

जब आती है तेरी याद

कृष्ण चंद्र मिश्रा

और अधिककृष्ण चंद्र मिश्रा

    दूर परदेश में

    सड़कों पर दुनिया भर की धूल फाँक रहा हूँ

    देख प्रिये!

    जो रोजी-रोटी मुझसे दूर भाग रही है

    मैं उसके पीछे-पीछे भाग रहा हूँ

    मेरा मन भी का बहुत करता है

    तेरे नज़दीक आने को

    अपने बच्चों से लाड़ लगाने को

    प्यार जताने को

    ऐसा नहीं है कि

    मैं भूल गया हूँ तुझे

    ना ही भूल सकता हूँ...कभी

    जैसे ही रोटी का टुकड़ा तोड़ता हूँ

    तेरी याद आती है

    फ़ाख़्ता-सी ज़िंदगी हो गई है अपनी

    कभी (भाबर) मैदान तो कभी (सांकर) पहाड़

    देवता दाहिने होंगे तो

    कार्तिक में घर आऊँगा

    अपना पेट काटकर भी, बच्चों के लिए दाने लाऊँगा

    चार दिन की ही सही सुख होगा

    इस साल

    मैं पूछूँगा तेरे हाल, तू पूछना मेरे हाल

    तब तलक्

    बच्चों का ध्यान रखना

    माता-पिता का मान रखना

    देवताओं के थान रखना धूप

    कितने ही कष्ट हों चाहे

    मत करना कोई चूक

    मैं आऊँगा लौटकर मेरा इंतज़ार करना

    गाय-भैंसों को घास देना

    बच्चों को प्यार करना

    सिद्ध-भूमिया की जाप

    देवी देवताओं की थाप

    को मत छोड़ना

    मैं तेरा, माँ-बाप तेरे,

    घर-परिवार तेरा...

    मुँह मत मोड़ना

    तेरे भरोसे है मेरे घर परिवार की लाज

    मेरी सुआ (प्रिये) आँख भर आती हैं

    जब आती है तेरी याद...

    जब आती है तेरी याद।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कृष्ण चंद्र मिश्रा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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