अपना घर

और अधिकवीरेन डंगवाल

    आख़िरकार मुझे एक मयस्सर हुआ।

    बारिश की झड़ी को बटकर मैंने रस्से बनाए

    छाजन बनाया ताड़ के मज़बूत पत्तों का

    एहतियात केलिए ऊपर से आकाश की पीली पोलीथीन की

    चादर भी तान दी

    फ़र्श के लिए कई दिनों तक

    मैं चोरी से काटता रहा चाँदनी के चौकोर टुकड़े

    दीवारें पोतने के लिए लाया मैं दोस्तों और देवताओं से रंग

    यों मुझे एक घर मयस्सर हुआ अधेड़ उम्र में।

    मेरे घर में एक कोना पिता का है

    जो काफ़ी उम्रदराज़ हैं मैं अपराधियों की तरह सोचता हूँ

    एक में हम दोनों जन

    एक में बच्चे और किताबें

    एक मेहमान का है जिसे अक्सर मैं ही लेटने-बैठने-खाने और चोरी से सिगरेट वग़ैरह

    पीने के काम लाता हूँ

    इस कोने में मार्क्स और ब्रेख्त की

    तस्वीरें लगी हैं।

    एक कोना टेलीफ़ोन के लिए भी है

    जिसके बग़ैर आजकल गुज़र नहीं

    एक कोना टेलीविज़न के लिए भी है

    जिसके बग़ैर आजकल गुज़र नहीं

    एक गुप्त कोना भगवान के लिए भी है

    जिसके बग़ैर आजकल गुज़र नहीं।

    यों हर ज़रूरत को ध्यान में रखकर बना

    एक सात कोनों वाला घर मुझे मयस्सर हुआ

    यह घर सारा जीवन मेरे साथ चलेगा

    बैंक की क़िस्तों की तरह।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कविता वीरेन (पृष्ठ 170)
    • रचनाकार : वीरेन डंगवाल
    • प्रकाशन : नवारुण
    • संस्करण : 2018

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