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होरी आइ गई रे!

hori aai gai re!

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

होरी आइ गई रे!

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    (लोकगीत)

    क्वैली कूकि, बौर भदराने,

    होरी आइ गई रे।

    होरी आइ गई रे।

    ड्वाला पछियहुवा झकझोर,

    मचिगा ठौर-ठौर पर सोर,

    नाचे कुंज-कुंज बन मोर,

    चहुँदिसि भा मस्ती का जोर,

    बठिया ल्यासैं नारि बिभोर,

    प्वातैं बखरिन-घरन पिंडोर।

    फूले रुस, बबुर बतियाने,

    होरी आइ गई रे।

    गलियन थिरके कुँवर-कन्हाई,

    गोपी-ग्वाल उठै हरसाई,

    ख्यालैं रँग सब लोग लुगाई,

    लड़ि-भिड़ि होइ अँबीर प्वताई,

    ना क्वै द्याखै बहिनी-भाई

    खटके कुँवा कीच अधिकाई,

    भौजी भीजीं, द्यवर सिहाने,

    होरी आइ गई रे!

    कपड़ा फटे-पुरानि बिहाय,

    पहिंदिनि नव-तहजद्द सियाय

    संबत सुनैं हिये हुलसाइ,

    पूछैं हानि लाभ अठिलाइ,

    आसिस देइँ लेइँ सुखु पाइ

    आँखिन काजरु नवा लगाइ।

    बाजा सूपु परेत पराने,

    होरी आइ गई रे।

    धमहरि उठी मजीरा खनके,

    ढ्वालन पर ठन-ठन सुर ठनके,

    झूमे रसिया अपने मन के,

    होरी गाइ उठे बेतनके

    ल्वटियन पर पैसा तुन तुनके,

    नाचे जन-मन घुँघुरू झनके।

    कुंजन राधा-कृष्ण हयराने,

    होरी आइ गई रे।

    भ्वरहें पसिया किहिसि ग्वहारि,

    धंधर दीन्हिसि होरी बारि,

    तरुनी बल्ला-पगिया डारि,

    अपने आंचर लेइ सँभारि,

    मनई अरसी-जौ बौछार,

    फेरी घूमैं जयति पुकारि।

    आगि बुती, प्रहलाद द्यखाने,

    होरी आइ गई रे।

    क्वैली कूकि, बौर भदराने,

    होरी आइ गई रे।

    होरी आइ गई रे।

    11 मार्च 1958 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 43)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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