विश्वामित्र द्वितीय यानी मैं

wishwamitr dwitiy yani main

आश करण अटल

आश करण अटल

विश्वामित्र द्वितीय यानी मैं

आश करण अटल

और अधिकआश करण अटल

    मैं विश्वामित्र की तरह

    तपस्या करता रहा

    तिल-मिल गलता रहा

    दिन में रात में गर्मी में बरसात में

    तपस्या चलती रही

    मन में आश्वस्त था

    फल गई तो फल गई

    वरना मेनका तो कहीं नहीं गई

    एक दिन यों हुआ

    मेरी तपस्या में विघ्न पड़ा

    झन-झन पायल की झनकार सुनाई पड़ी

    फिर रागिनी छिड़ी

    वातावरण में मस्ती छाई

    मैं समझा अबके मेनका आई

    तभी एकबारगी मुझे

    उस नादान लड़कियों की याद आई

    जिनके पीछे मैं बहुत घूमा

    पर जिन्होंने मुझे घास तक नहीं चराई

    अब जब कल वे मेनका वाली बात सुनेंगी

    तो ख़ूब जलेंगी

    अच्छा हुआ उनका भ्रम गया

    अपना तो मेनका के साथ जम गया

    तपस्या करते-करते बाल बढ़ गए दाढ़ी बढ़ गई

    जटा में जूएँ पड़ गई

    मन में सोचा—मेनका इस रूप में देखेगी

    तो क्या सोचेगी

    मन को समझाया, सोचेगी क्या?

    मेनका हम ऋषि-मुनियों के लिए नई थोड़ी है

    उसने कइयों की तपस्या तोड़ी है

    वो ख़ूब खेली-खाई है

    उसको पता है ये जटा-जूट और कृशकाया ही

    हम तपस्वियों की कमाई है

    तभी एकदम पास में बाँसुरी के स्वर सुनाई पड़े

    मेरे कान हुए खड़े

    कि ये क्या गड़बड़ घोटाला है

    दाल में ज़रूर कुछ काला है

    समाधि से जगा आँखें खुलीं तो झटका लगा

    वहाँ मेनका नहीं साक्षात् खड़े थे कृष्ण कन्हाई

    बोले—“वत्स, तेरी तपस्या पूर्ण हुई बधाई

    तू भवसागर तर गया।”

    मैंने मन में सोचा कि मर गया

    ये तो भगवान जी गए

    वो अप्सरा की बच्ची मेनका कहाँ मर गई

    लगता है, तपस्या फल गई

    और मेनका हाथ से निकल गई

    मेरा दिल टूट गया, मैंने डरते हुए पूछा—

    “भगवान! वो मेनका वाला सीन कहाँ छूट गया?”

    भगवान बोले—“भक्त,

    जब कोई तपस्या तोड़ने के लिए मेनका को भेजता है

    मेनका करती तप का हरण

    उससे पहले मैंने कर लिया तेरा वरण।”

    मैंने कहा—“बॉस! ये आपने अच्छा नहीं किया

    पता नहीं किस जनम का बदला लिया

    मैंने इस दिन के लिए तपस्या की थी?

    आपको बीच में आने की क्या पड़ी थी?”

    अब भगवान हैरान, पूछा—

    “जब तुझे तेरी आवश्यकता नहीं थी

    तो तू तपस्या करने क्यों लगा?”

    मैंने कहा—“प्रभु!

    मेरे साथ हुआ है दग़ा, बात यों बढ़ी

    कि मैंने विश्वामित्र की कहानी पढ़ी

    और कहानी में मेनका का

    तपस्या तोड़ने आना मुझे भा गया

    और इस चक्कर में यहाँ गया

    मुझसे तो विश्वामित्र ठीक रहे,

    बुढ़ापे में मेनका पा गए

    यहाँ मेनका की ज़रूरत थी तो आप गए

    प्रभु, आप हमेशा गड़बड़ करते रहे हैं

    पहले विश्वामित्र का बुढ़ापा बिगाड़ा

    अब मेरी जवानी के पीछे पड़े हैं

    मैंने माना कि बड़ी बात है आपको पाना

    पर आपको कौन समझाए

    ये तो ठीक वैसे ही हुआ

    जैसे किसी मुख्यमंत्री को

    राज्यपाल बना दिया जाए

    हालाँकि राज्यपाल का पद बड़ा है

    पर मुख्यमंत्री का अलग मज़ा है

    प्रभु, मेरे साथ अन्याय हो रहा है

    अभी मेरी उम्र ही क्या है

    अभी आप जाइए और मेनका को भेज के

    मेरी तपस्या तुड़वाइए

    पहले मेनका को पा लूँ तो फिर आपको पा सकूँगा

    अगर मेनका छूट गई तो

    आपको मेनका छूट गई तो

    आपको पाकर भी नहीं पा सकूँगा

    जीवन-भर मेनका ने ख़यालों में उलझा रहूँगा।”

    स्रोत:

    हास्य-व्यंग्य की शिखर कविताएँ (Pg. 69)

    • लेखक: आश करण अटल
      • संस्करण: 1
      • प्रकाशक: राधाकृष्ण पेपरबैक्स
      • प्रकाशन वर्ष: 2013

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