हरिसभा

अंचित

हरिसभा

अंचित

और अधिकअंचित

     

    हरिसभा उस मंदिर का नाम है, जिसके पास रहते हुए कवि का जीवन गुज़रा है...

    एक

    नई चहारदीवारी के पास 
    पुराने दुकानदार आकर जम गए 
    यंत्रवत। 

    पुराने का जो भी अवशेष बचा है, 
    सब गहरे मांस में गड़ा हुआ। 

    दुःख कि ईंट उठाता-रखता दिन भर मज़दूरी करता।
    सुख कि रुकता क्षण भर फिर आगे बढ़ जाता।  

    ऐसे जीवन बीत रहा है, 
    जैसे जीवन बीत रहा था। 

    दो 

    ज़मीन तो ज़मीन थी,
    ईश्वर तो हमेशा क़ब्ज़े में ही रहा है। 

    कुछ ग्लानि भीतर जमी,
    समय बीता पिघल गई।

    जो खोया, भले ही खो गया 
    याद आता रहा, अविश्वास की तरह

    जितनी बार तेज़ हँसे उसके बाद,
    एक-एक टूटा पत्ता जाने कहाँ से पुकारता रहा। 

    तीन 

    इतना ही हुआ इतने दिनों में, हम भूल गए 
    नाम फूलों के, बनाई क़ंदीलों के,
    बूढ़ों के। 

    एक आधा दीवारें हार जाते थे हर साल 
    सिर्फ़ दीवारें बचीं अचानक एक साल। 

    हमारी स्मृति में इतनी जगहें बन गईं,
    उल्लू भी बसने लगे वहाँ।

    और ख़ून भी बहा इतनी दूर, अपनी 
    मिट्टी तक नहीं मिल पाई। 

    चार 

    कई हाथ थे जिन्होंने छुआ था चेहरे को, खो गए 
    कई आवाज़ें थीं जिनको आदत की तरह जानते थे,
    खो गईं।

    दूब उगती थी मैदान के एक कोने में, मैदान ही नहीं रहा। 
    इतनी हिंसा बीती हृदय पर, आत्मा छलनी हो गई। 

    कितनी जल्दी बीत गया समय।
    कितना समय हो गया और अभी भी उतना ही गहरा है ज़ख़्म। 

    भीड़ थी जहाँ, वहाँ सुनसान है 
    जहाँ भीग जाते थे बारिश में, वहाँ अब रसोई है। 

    पाँच 

    भागता रहा कितने दिन, भागता रहा और उसी जगह 
    धँसा रहा ज़मीन में, और फिर भी साँस चलती रही, 
    बस बोझ बढ़ता गया। 

    दिमाग़ बार-बार लौटता था उजाड़ से शहर की ओर 
    सपने बार-बार चले जाते थे बेपरवाह नदियों की तरफ़ 

    जानता था धँसा हूँ, फिर भी गिरता जाता था बिना थमे, 
    सब जानी-पहचानी कीलें उखाड़ दी गईं दीवार से।  

    दिल था जो मेरे भीतर खो गया जाने कहाँ 
    उसकी आँखों में सैकड़ों समंदर रोज़ पैदा होते थे। 

    छह

    बदल जाता है सब आख़िरकार, 
    खो जाते हैं लोग, पुरानी कहानियों 
    में यही था लिखा हुआ।

    एक बरगद था कहीं, एक ख़ून की बूँद, 
    छिटकी कहीं से, जीवन शुरू हुआ, चिड़ियों 
    के घोंसले थे वहाँ और तब तक चलता रहा जीवन 
    जब तक एक चिड़िया उड़ न गई किसी दिन। 

    मई पटी रहती थी जामुनों से, जीवन से 
    उसी महीने उजाड़ शुरू हुआ और आकर बस गया वहीं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अंचित
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    संबंधित विषय :

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY