हरेक के होता है एक दुखता घेरा
harek ke hota hai ek dukhta ghera
यूरे फ्रनीचैविच-प्लोचार
Jure Franicevic Plocar
हरेक के होता है एक दुखता घेरा
harek ke hota hai ek dukhta ghera
Jure Franicevic Plocar
यूरे फ्रनीचैविच-प्लोचार
और अधिकयूरे फ्रनीचैविच-प्लोचार
हरेक के होता है एक दुखता घेरा
और एक ठंडा
पिचपिचा उथलापन,
कोना सिहरन का,
स्वर जो लौट आता है।
पर काफ़ी है विस्तार दो पैरभर
कि मनुष्य खड़ा हो सके
कि सीधा सपने देख सके।
घुटने टेकने के लिए तो अधिक चाहिए,
रेंगने के लिए सबसे ज़्यादा।
हरेक के होता है एक छिपा हुआ मर्मस्थल,
छोटी-सी डिबिया दीवाल पर तोड़ी हुई
एक किनारा मतली का।
पर खड़े होने के लिए काफ़ी है दो पैरभर धरती
और एक मस्तूल चाह का।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 107)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : यूरे फ्रनीचैविच-प्लोचार
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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