हर जीवन में दरारें हैं
har jivan mein dararen hain
हर जीवन में दरारें हैं
जिनमें निकटजन उत्सुक झाँकते हैं
भागते हमारे दिनों को ताकते हैं।
और यों कुछ भी नहीं है केवल हमारा ही :
हम इस ज़िंदगी को गटकते हैं मदिरा-सी
दूसरे के हाथ के गंदे प्याले की।
पर जिसका मिज़ाज नाज़ुक है, शर्मीला है,
हर तरह से उन छिद्रों को ढकना चाहता है
अपने मन के, और अनदेखा ही रहना—
कि उसका चेहरा बिलकुल शांत रहे,
उजाड़ खेत जैसा निःशब्द जिसके नीचे
किसी भूमिगत नदी की बहती हों लहरें।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 60)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : दोब्रिषा त्सेसारिच
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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