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हे, प्रसन्नते!

he, prsannte!

अनुवाद : यतेन्द्र कुमार

पर्सी बिश शेली

पर्सी बिश शेली

हे, प्रसन्नते!

पर्सी बिश शेली

और अधिकपर्सी बिश शेली

    (1)

    हे, प्रसन्नते! विरल-विरल ही,

    तू है आती!

    तज मुझको इतने दिन से तू,

    कहाँ गई थी?

    बीते हारे-हारे हैं मुझको निसिवासर,

    चली गई ऐसे तू मुझको जब से तज कर!

    (2)

    पा सकता तेरा कैसे फिर,

    मुझसा प्राणी संग?

    मुक्त-हर्षितों की साथिन पर

    दुःख पर कसती व्यंग्य!

    छोड़ उन्हें, जिनको है तेरी नहीं ज़रूरत,

    मिथ्या देवि! किया है तूने सबको विस्तृत!

    (3)

    ज्यों बिस्तुइया परछाई से

    कंपित पल्लव की।

    त्यों तू भगती दुःख झाई से,

    इन निश्वासों की।

    'तू समीप है नहीं’, शिकायत इसकी करती,

    पर इस पर तू कान तनिक भी कब है धरती?

    (4)

    आओ, तो ये गीत करूँ फिर

    हर्षित लय में बंद!

    करुण भाता, आती है पर,

    पाने को आनंद!

    आएगी ज्यों क्रूर पंख करुणा तेरे

    काटेगी, होगा फिर संग रहना मेरे!

    (5)

    देवि, प्यार तू जिनको करती,

    मुझे प्रीतिमय सब

    सद्य भूमि, नव पर्ण पहिनती

    निशि तारकमय जब।

    शिशिरकाल की साँझ सवेरे का आलम,

    लेती हैं जब जन्म कुहर पर्त स्वर्णिम!

    (6)

    हिम हैं प्रिय, सब रूप चमकते

    प्रिय लगते मुझको तुषार के!

    लहर, पवन, तूफ़ान, गरजते,

    सब बनते हैं पात्र प्यार के!

    जितने भी है रूप प्रकृति के प्रिय लगते,

    वे भी मनुज दैन्य से पावन हो सकते!

    (7)

    मुझे शांत निर्जनता है प्रिय,

    प्रिय समाज है ऐसा।

    मेरे तेरे मध्य शांत मय,

    बुद्ध और सद जैसा,

    अंतर क्या? बस यही हुई उपलब्ध तुझे,

    खोज रहा मैं अभी, किंतु कम प्रिय तुझे!

    (8)

    प्रिय है प्यार किंतु उसके पर

    उड़ जाता वह द्युति सा!

    सब हैं प्रिय पर मुझको प्रियतर,

    देवि नहीं है तुमसा।

    तू ही मेरी प्यार, ज़िंदगी, माना सत्वर,

    हे प्रसन्नता देवि! बना मेरा उर निज घर!

    स्रोत :
    • पुस्तक : शेली (पृष्ठ 33)
    • संपादक : यतेन्द्र कुमार
    • रचनाकार : पर्सी बिश शेली
    • प्रकाशन : भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ़

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