विकास के बाद बारिश का सुख नहीं मिलता
पैरों में कादो-माटी अब नहीं लगता
सड़कें जलमग्न तो हो जाती हैं
पानी बरसात का नहीं लगता
कमर भर पानी से गुज़रने से जो रंज और सुख मिलता
कोलतार की नई सड़कों पर पैर नहीं धँसते
पानी पार करते डगडगमगाने और
किसी अपने से थाम लिए जाने का सुख नहीं मिलता
थोड़ी-सी ज़मीन बची रहनी चाहिए
बरसात में गीली होने के लिए
गुज़रते हुए आदमी के पैर धँसने के लिए
पुआल और खर-पतवार की थोड़ी छतें बची रहनी चाहिए
घर के भीतर बरसात के सोतों के बहने के लिए
नींद में आदमी के भीगने के लिए।
- रचनाकार : मिथिलेश श्रीवास्तव
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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