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हमारे समय की कविता

hamare samay ki kavita

अर्पिता धमीजा

अर्पिता धमीजा

हमारे समय की कविता

अर्पिता धमीजा

और अधिकअर्पिता धमीजा

    किसी का रोना देखा

    तो किसी का मुस्कुराना

    इंसानियत के मरने पर

    इंसान को

    बदनाम महफ़िलों में जाते देखा।

    आज़ादी के नारे लगाती

    आज़ादी को,

    किसी मेज़ के नीचे ग़ुलाम होते देखा।

    और जकड़ी हुई ग़ुलामी ने

    सिर्फ़ रात देखी

    सूरज चढ़ते कभी ना देखा।

    शोषित को देखा

    शोषण को देखा

    फ़साने से बुनते हुए

    हक़ीक़त के दावों को देखा।

    गर्मी को

    मौसम की ज़मीन से उतर

    किसी की आँखों और बाज़ुओं में

    चढ़ते देखा

    और उसकी तपन को महसूस करने वाले को

    आँखो के अंदर ही बिलखते देखा।

    सर्दी को भी देखा

    जमे हुए

    रिश्तों में।

    रोते हुए बच्चों के लिए

    चाँद को रोटी बनते देख

    थालियों में चार दिन का खाना फेंकते

    बच्चों ने कुछ भी ना देखा।

    सत्ता को सत्ता के भीतर

    संघर्ष करते देखा

    उसी सत्ता को

    अपने ही मद में

    चूर होते भी देखा।

    ख़्याल के टकराव में

    भाव नाश होते देखा

    विचारों के बाज़ार में

    यथार्थ को बीकते देखा।

    क्रूरतम और मधुर

    हर तरह की कविता को

    सत्य होते देखा है

    कविताओं के शब्द कम

    पड़ सकते हैं

    हमारे समय ने

    इतना समय देखा है।

    लेकिन,

    उससे आगे चलने की होड़ में

    अनायास ही पीछे छूट गए इंसान में

    और उसकी सत्ता ना समझ पाए

    इंसान की वजह से

    हमारे समय ने कम ही देखा है

    ख़ुद को हमारे साथ!!!

    स्रोत :
    • रचनाकार : अर्पिता धमीजा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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