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हैं ऐसे भी जो मर गए प्रेम करते हुए

hain aise bheen jo mar ge prem karte hue

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

ज़्वोनीमीर गोलोब

ज़्वोनीमीर गोलोब

हैं ऐसे भी जो मर गए प्रेम करते हुए

ज़्वोनीमीर गोलोब

और अधिकज़्वोनीमीर गोलोब

    हैं ऐसे भी जो मर रहे हैं, पर मृत्यु नहीं पहचानते

    और हर दिन यही होता है निराभास,

    भुलाए हुए, खोए हुए कि होता है।

    हैं ऐसे भी जिन्हें मृत्यु आई जब हँस रहे थे,

    हँसते-हँसते आँसू रहे थे, पर हँसी सिकुड़ गई

    अनिश्चित झुर्री में होटों के तट पर,

    बच गया केवल गरम पानी और नम।

    हैं ऐसे भी कि जो मरते केवल अपने लिए, उनमें

    सब जीते हैं, उनमें सब खोजते हैं अपनी मृत्यु,

    पा जाते उसे उस सब में जो उनका है।

    हैं ऐसे भी जो मरते केवल दूसरों के लिए, उनमें सभी मरते हैं,

    सब उनमें मरते हैं वे स्वयं भी। अपने बदन के कोने में

    वे साँस लेते हैं सुबकते हैं।

    हैं ऐसे भी जो केवल साँस भरकर रह गए

    घंटे की भाँति जिस पर हृदय की हर चोट

    गूँजती है बिजली की तड़क की तरह।

    हैं ऐसे भी जो विदा लेते हैं बिना जाने कहाँ जा रहे हैं,

    किसी से हाथ मिलाते हैं। उनका भाग्य सार्थक होता

    चिड़िया के पंख पर जादुई संकेत लिखने से।

    हैं ऐसे भी जिन्हें मृत्यु आई प्रेम करते में।

    उनके बारे में कह सकता यदि शब्द रीते होते

    लार्वा की केंचुल की तरह जिसमें से सुंदर तितली जनमती।

    हैं ऐसे भी जो मर गए आलिंगन में। होगी क्या सुंदर मृत्यु

    उस लपट से जो अपने तेज़ दाँत

    सिसकते गले पर सुस्ताती?

    हैं ऐसे भी जिन्होंने मृत्यु का स्वागत किया ज्यों स्त्री का,

    प्रेमियों की भाँति जो तत्पर शासन करने को, विजित होने को,

    और जो नहीं जानते पराजय कहाँ आरंभ होती है

    और कहाँ विजय समाप्त होती है।

    हैं ऐसे भी जो मर गये, पर वह भी काफ़ी नहीं था

    और उन्होंने दुहराई अपनी मृत्यु

    बच्चे की भाँति जो दुहराता दोहों को।

    हैं फूहड़ भी, उलझे हुए, भयभीत और अस्तव्यस्त।

    उनके बारे में पवन गाती है लुढ़काती हुई अपना भारी शरीर

    समुद्र के धीमे पाट में।

    हैं ऐसे भी जिन्होंने मरते समय जीवन को गाली दी

    शब्दों में जिनमें कटुता थी

    उन काँटों की तरह जो सुबकते हर गुलाब के पीछे!

    अंतत:, हैं ऐसे भी जो मर गए यकायक,

    आकाश में ऊँचे फेंके गए पत्थर की तरह।

    मृत्यु ने भी उन्हें रोका नहीं

    उस उड़ान में जो अभी भी चल रही है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 125)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : ज़्वोनीमीर गोलोब
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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