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ग्रेफ़िटी

grefiti

महेश चंद्र पुनेठा

और अधिकमहेश चंद्र पुनेठा

    प्रश्नों से भरे बच्चे

    तब अपने जवाब लिखने में व्यस्त थे

    उन्हें फ़ुरसत नहीं थी सिर उठाने की

    मेरे पास फ़ुरसत ही फ़ुरसत

    इतनी कि ऊब के हद तक

    मेज़ों-दीवारों-बेंचों में

    लिखी इबारत पढ़ने लगा

    कहीं नाम लिखे थे पूरी कलात्मकता से

    लग रहा था अपना पूरा मन

    उड़ेल दिया होगा लिखने वाले ने

    कहीं आई लव यू

    या माई लाईफ़... जैसे वाक्य

    पता नहीं

    जिसके लिए लिखे गए हों ये वाक्य

    उनका जीवन में

    कोई स्थान बन पाया होगा कि नहीं

    कहीं फ़िल्मी गीतों के मुखड़े

    कहीं दिल का चित्र

    खोद-खोदकर

    जिसके बीचोबीच तीर का निशान

    जैसे अमर कर देना चाहो हो उसे

    कहीं फूल-पत्तियाँ और डिजायन

    कहीं गलियाँ भी थी

    कुछ उपनामों के साथ

    कुछ धुंधला गई थीं

    और कुछ चटक

    कुछ गड्डमड्ड नए पुराने में

    आज कुछ यही हाल होगा

    उनकी स्मृतियों

    और भावनाओं का

    यह कोई नई बात नहीं

    इस तरह की कक्षाएँ

    आपको हर स्कूल में मिल जाएँगी

    यह स्कूल से बाहर भी

    मैं पकड़ने की कोशिश कर रहा था

    कि ये कब और क्यों लिखी गई होंगी

    ये इबारतें

    क्या चल रहा होगा

    उनके मन-मस्तिष्क में उस वक़्त

    क्या ये उनकी ऊब मानी जाए

    या प्रेम और आक्रोश जैसे भावों की तीव्रता

    जिसे रख पाए हों दिल में

    या किसी तक अपने मन की

    बात को पहुँचाने का एक तरीक़ा

    लेकिन मैं नहीं पकड़ पाया

    जब बच्चे जवाब लिखने में व्यस्त थे

    मेरे मन में

    अनेक सवाल उठ रहे थे

    क्या दुनिया के उन समाजों में भी

    इसी तरह भरे होते होंगे

    मेज़ें और दीवारें

    जहाँ प्रेम और आक्रोश की

    सहज होती होगी अभिव्यक्ति

    जहाँ बच्चों को

    जबरदस्ती बैठना पड़ता होगा

    बंद कक्षाओं में...

    या कुछ और है इसका मनोविज्ञान?

    स्रोत :
    • रचनाकार : महेश चंद्र पुनेठा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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