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घसियारिनों के गीत

ghasiyarinon ke geet

मोहित नेगी 'मुंतज़िर'

मोहित नेगी 'मुंतज़िर'

घसियारिनों के गीत

मोहित नेगी 'मुंतज़िर'

और अधिकमोहित नेगी 'मुंतज़िर'

    लग गया है

    चौमास

    कोहरे से ढकी हैं

    चोटियाँ।

    पहाड़ी झरने बहा कर ले

    जा रहे हैं पत्थर।

    नम ज़मीन पर पेड़ों के नीचे

    उग आए हैं जंगली कुकुरमुत्ते

    घुटनों तक उग आई है

    घास

    दूर से सुनाई दे रहे हैं

    घसियारिनों के

    बाजूबंद गीत

    गीत?

    नहीं!

    ये गीत नहीं हो सकते

    ये हैं उनकी अंतरात्मा का रुदन

    उनके दिलों में जमा दुःख

    जो गीत बनकर फूट रहा है बाहर

    जैसे फूट रहे हैं

    पहाड़ी झरने

    चारों ओर।

    वे उलाहना दे रही हैं

    अपने उस पिता को

    कि उसको क्यों ब्याहा गया

    इस मुल्क

    जहाँ काम से टूटी जाती है कमर

    जहां घास के लिए भटकना पड़ता है

    मीलों।

    वे उलाहना दे रही हैं

    अपने उस भाई को

    जो इस बार नहीं आया

    भेंटोली लाकर

    उसके पास

    और उसकी सास

    इस बात पर

    देती रही उसे उलाहने।

    वे काटते हुए घास

    और गाते हुए गीत

    देखती हैं पल पल में राह

    कहीं कोई मैती

    आये लेने उसे

    और वो घास काटने में व्यस्त

    उसे देख ही पाए।

    दोपहर हो गई है

    घसियारिनें जा रहीं हैं घर की और

    लिए घास के बोझ

    एकदम शांत

    जैसे गाकर बाजूबंद

    उतर गया हो मन का बोझ।

    दूर एक गधेरे में

    एक घसियारिन

    अब भी गा रही है

    बाजूबंद

    आवाज़ तेज़ है

    शायद उसका दुःख हो

    और प्रगाढ़।

    शाम हो गई है

    जंगल भी खाली हो गया है

    मग़र अब भी

    गूंज रहे हैं

    वहां बाजूबंद।

    कई सदियों पहले से

    आज तक के गाए हुए

    चोटियों पर

    घाटियों में

    गधेरों में।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मोहित नेगी 'मुंतज़िर'
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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