गीत मेरे हृदय को
geet mere hriday ko
उदास हूँ और जा रहा हूँ प्रशांत जल की ओर।
यहाँ हरिणी आती है झुटपुटे में और पीती है, भयभीत।
काटा हुआ पौधा सूखता धूप में, सूखता पौधा हरा।
मैं किशोर था, किशोर। पर अब नपे-तुले पग धरता
सिर भी गिरा हुआ
उसकी भाँति जो माँ के लिए दुखी है।
महराव यों बिखर गई; तीर फिंक गए।
फैला हुआ वृक्ष ढह रहा।
सुलगा हुआ हृदय मेरा मुझमें
जल रहा है। राख हो जाएगा सूखे भूसे-सा; बिना चीत्कार,
बे-आह।
चुपचाप मरती हैं, चुपचाप मरती हैं कसाईख़ाने की भेड़ें।
लेकिन सब हम मरते हैं, हृदय मेरे! गँवार और संपन्न!
मृत्यु हमारा अच्छा गड़रिया है। है उसके पास सुदृढ़ बेंत
तभी तो काटे जाने वाले पशुओं के समान कर देती हमें।
एक ही बात है, साँझ को आह भरूँ या सबेरे,
बैठा हुआ हरे ज़ैतून के नीचे, क्षुब्ध,
या यदि हर्षध्वनि कर उठें प्रसन्न होट मेरे
चाँदी के परों वाली कबूतरी-से।
वस्त्र तेरे, कुमारी, ओ कली,
महकते अगर से, मेंहदी और तज से, अद्भुत।
तेरे पास से भिक्षुक गुज़रता; वो बोरी पहिने है।
देख, घिर रहा धुँध चट्टानी पहाड़ों पर
बलि की आग के धुएँ-सा, नीला और हल्का।
पूरबी बयार सहलाती वन को, जो कुंचित और धुँधला,
और भुट्टा, मस्तूल-सा, झूमता समतल पर मानो
ईश्वर की हथेली पर।
लेकिन...सब हम मरते हैं, हृदय मेरे! गँवार और संपन्न!
मृत्यु हमारा अच्छा गड़रिया है। है उसके पास सुदृढ़ बेंत
तभी तो काटे जाने वाले पशुओं के समान कर देती हमें।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 76)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : द्रागूतिन तदियानोविच
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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