सहयात्री मुक्तिबोध

सिद्धेश्वर सिंह

सहयात्री मुक्तिबोध

सिद्धेश्वर सिंह

और अधिकसिद्धेश्वर सिंह

    राजनाद गाँव पर कुछ धीमी हुई रेलगाड़ी

    झपट कर डिब्बे में सवार हो गए मुक्तिबोध

    लगे पूछने—पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?

    मैं क्या कहता नहीं सूझा कोई त्वरित और माक़ूल जवाब

    वे मुस्कुराए बतियाते रहे देर तक

    लगभग आत्मालाप जैसा कुछ असंबद्ध बेतरतीब

    और जब नागपुर आया तो उतर गए तेज़ी से

    यह कहते हुए कि सुनो—तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़

    चाँद का मुँह अब भी टेढ़ा है

    और ख़तरे कम नहीं हुए हैं अँधेरे के

    यह नागपुर था

    संतरों के चटख रंग बिखरे हुए थे चारों ओर

    इसी रंग में घुलती चली जा रही थी हर चीज़

    एक बार को मन हुआ कि स्थगित कर दूँ यात्रा

    चला जाऊँ वर्धा या पवनार

    गांधी और विनोबा की स्मृतियों में डूबकर

    मुक्त होने की कोशिश करूँ रोज़-रोज़ के खटराग से

    यह भी सोचा कि फ़ोन लगाऊँ कवि बसंत त्रिपाठी को

    चौंका दूँ कि देखो तुम्हारे शहर से गुज़र रही है मेरी रेल

    और मैं याद कर रहा हूँ तुम्हारी कविताओं को

    यह अलग बात है कि कुछ और कह गए हैं मुक्तिबोध

    थोड़ी देर पहले ही

    अलसा गया वातानुकूलन की सुशीतल हवा में

    सोचा कि भोपाल में उतर लूँगा

    देख आऊँगा भारत भवन का जलवा

    अगरचे वह अब भी है बरक़रार

    पूछ लूँगा कि कहाँ है काम पर जाते वे बच्चे

    जो बताए गए थे राजेश जोशी के हवाले से

    फिर सोचा

    भगवत रावत तो अब रहे नहीं

    आख़िर किससे मिलकर मिलेगा जी को तनिक आराम

    छोड़ दिया यह विचार भी

    और देखता रहा खिड़की के शीशे के पार

    दूसरी ओर एक दुनिया थी जिसके होने का बस आभास

    गोया कि एक प्रतिसंसार

    गुज़रा ग्वालियर

    गई झाँसी

    छूटा मुरैना धौलपुर

    पता नहीं कब निकल गए आगरा मथुरा

    और दिल्ली के स्टेशन पर खड़ी हो गई गई अपनी ट्रेन

    खड़ा हूँ देश के दिल दिल्ली में

    अब धीरे-धीरे छूट रही है कविताओं की डोर

    धीरे-धीरे घर कर रहा है भीड़ में खो जाने का डर

    ठीक से टटोलता हूँ अपना सामान

    और ऑटो पकड़कर

    तेज़ी से चल देता देना चाहता हूँ आईएसबीटी आनंद विहार

    वहीं से मिलेगी

    अपने क़स्बे की ओर जाने वाली आरामदेह एसी बस

    एक पिट्ठू बैग है पीठ पर लदा

    बैग में कुछ किताबें हैं कविताओं की

    कविताओं में एक दुनिया है छटपटाती हुई

    जैसे कि कोई पुकारती हुई पुकार

    जैसे कि अँधेरे में उतरती हुई सीढ़ियों पर कोई पदचाप

    जैसे कि कमल ताल में किसी बेचैन मछली की छपाक

    बार-बार परेशान करती हैं ये आवाज़ें

    और मैं जीन्स की जेब में हाथ घुसाकर

    हड़बड़ी में टटोलने लगता हूँ ईयरफ़ोन!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सिद्धेश्वर सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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