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खोते जाने का पूर्ण उदाहरण हूँ

khote jane ka poorn udahran hoon

सुमन शेखर

सुमन शेखर

खोते जाने का पूर्ण उदाहरण हूँ

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    समय की धार में उल्टे पाँव लेट जाता हूँ

    दिनों-दिन भाव का भूल पड़ता जाता है

    शब्द की राख से उपले बनाता हूँ

    मंद-मंद-सी खुलती ज़िंदगी को

    बहुत महीन धागे से खुरचता जाता हूँ

    साँसों की धुन पर रेत उड़ता है

    मुँह से भाप का बहना थम गया है

    आँखों में कोई बिम्ब नहीं बनते

    सुनते हैं कान मेरे, कोई वाक्य

    पैरों ने कब से आगे बढ़ना छोड़ रखा है

    अँगुलियों में मकड़े के जाले बुने हैं

    दिमाग शिथिल शांत स्मारक बन चुका है

    उस एक अदद पूर्ण क्षण को तरसा हुआ हूँ मैं सदियों से

    जिसमें वक़्त और नियति की बुनावट तंदुरुस्त रहे

    जानना है अगर इस कविता को

    तो शब्द नहीं, बचे हुए खाँके को पकड़ो

    उसमें घुली हुई नन्ही लकीरों को टटोलो

    शब्द सच नहीं होता

    उसकी लकीरें होती हैं सच

    जिस पर टंग कर झूलता है शब्द

    मैंने अब तक नहीं समझा है अपूर्णता की गरिमा और पराकाष्ठा

    खोते-खोते खोते जाने का पूर्ण उदाहरण हूँ मैं

    छोड़ते-छूटते जाने का सबसे उत्तम उदाहरण हूँ मैं

    कोशिश में हूँ एक पूर्ण कविता की

    जो बचा सकती है मुझे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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