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एक पत्ता

ek patta

विशाल कुमार

विशाल कुमार

एक पत्ता

विशाल कुमार

और अधिकविशाल कुमार

    पेड़ से गिरा एक पत्ता,

    जा मिला नदी में,

    हुआ जुदा अपने मूल से,

    अपने वजूद से।

    हँसता, खिलखिलाता,

    जो मिलाता था अपने संगियों से ताल,

    अब वह बह रहा है नदी की चाल।

    बहते-बहते कभी नाव में जाता,

    कभी जहाज़, कभी पनडुब्बी,

    कभी मछलियों के घर में,

    कभी-कभी बीच भँवर में,

    खेलता वह सभी मनोरंजक खेल।

    कभी फँस जाता कहीं

    सड़ी खाड़ी में,

    तो पसारता रुद्र विलाप,

    ईश्वर को याद कर

    करता अपने कर्मों पर पश्चाताप।

    लेकिन कर्म—

    किसके कर्म?

    आवेग नदी का, पानी नदी का।

    तैरते पत्ते का तैरने के अलावा क्या?

    क्या तैरना उसका?

    है क्या फिर उसका?

    जिसे वह कह सके अपना,

    जब छीन लिया गया हो उसका मूल ही?

    फिर भी

    है कुछ,

    जो है बहुत कुछ।

    है उसके पास उसका संसार,

    उस संसार की यादें।

    मछलियों के बच्चों के साथ

    लुका-छिपी की यादें,

    दूर देश से आए

    चीड़ के पत्तों के साथ

    बतियाने की यादें,

    बड़े पत्थर से टकराकर

    चोटिल होने की यादें।

    यादें उसकी स्मृति,

    खट्टी-मीठी अनुभवों की स्मृति।

    क्या तुम इसे भी कहोगे नदी की कृति?

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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