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तहिया कहब बतहिया

tahiya kahab batahiya

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

तहिया कहब बतहिया

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    बाजब तँ बाजब जे बाजल,

    बुद्धि हेतै गऽ कहिया।

    बात अनर्गल बाजब जहिया,

    तहिया कहब बतहिया॥

    जाहि दिन अहाँ बाँहिमे भरि कऽ

    तन के ताप मेटाओल

    प्राण कऽ देलौं धन्य, स्वर्णमय

    माटिक-देह बनाओल

    ओही दिन प्रिय जन्म-जन्म के

    साध पूर्ण भऽ गेल

    रहू कतहु बरु धन्य भऽ रहू,

    जनम सोगारथ भेल।

    सत्त कहै छी, सप्पत दै छी,

    हियाक हे यउ सिपहिया

    बात अनर्गल बाजब जहिया,

    तहिया कहब बतहिया॥

    लाल कमौआ खुद्दी बिधुनय,

    चोरक आगु सचार

    हर बहय से खढ़ खाए

    बकरी खाए अचार

    अङ-पोआङ धाङय गदहा,

    छुच्छ बरद के खोप

    आइ-माइ के काजर तक नहि,

    बिलाड़ के ठोप।

    चेङा-पोठी चालि सुतारय,

    रोहुक भेल सरधिया

    बात अनर्गल बाजब जहिया,

    तहिया कहब बतहिया॥

    चुट्टा पटकय साधु पेट ले,

    छन-छन उठय छगुन्ता

    चोर न्यायसँ नष्ट होइत,

    से देखक होइछ सेहन्ता

    बेटीमे जँ गनबय टाका,

    महामांस—सम दोष

    माइक उदर केर भाड़ा चाही,

    बेटामे भरि पोख।

    जान बुझू जंजाल, होइत अछि

    धीआक नित्य सरधिया

    बात अनर्गल बाजब जहिया,

    तहिया कहब बतहिया॥

    कनहा कुकुर मेमक कोरा,

    खीर-माँसु नञि पूछ्य

    टहलू सिक्कड़ धऽ जे घुमबय,

    कुकरो तकरा दूसय

    बारय नित नेता नेतक पथ,

    फेर धोधि अजबारय

    परतारय जनता के सदिखन,

    अपना टा के तारय।

    वाद समाजक बात बाद धरि,

    वोट नोट पुरहिया

    बात अनर्गल बाजब जहिया,

    तहिया कहब बतहिया॥

    कलह, गरीबी, राज अराजक,

    प्रीति मात्र स्वास्थ के

    निःस्वार्थक साम्राज्य, पलटतै

    भाग्य कोना भारत के

    हम पूछै छी, प्रियतम! आखिर,

    निविड़ अन्ध फारत के

    त्रस्त-स्तब्ध विकल जनजनकेँ,

    कुण्ठासँ तारत के?

    अरुण ज्वाल उर-पुरमे धधकय

    धू-धू माटिक देहिया

    बात अनर्गल बाजब जहिया,

    तहिया कहब बतहिया॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 20)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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