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दो बूँद

do boond

अनुवाद : सुरेश सलिल

ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त

और अधिकज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त

    (जब जंगलात जल रहे हों,

    तो गुलाबों के लिए अफ़सोस का वक़्त कहाँ!—स्लोव्स्की)

    जंगलात जल रहे थे—

    तब भी उन्होंने अपनी गर्दनें

    बाँहों में भर लीं गुलदस्तों की तरह।

    लोग घरों की ओर दौड़े—

    उसने कहा, इतने घने थे मेरी घरवाली के केश

    कि उनमें छुपा जा सकता था।

    एक कंबल के नीचे से सुनाई दीं

    उनकी निर्लज्ज फुसफुसाहटें

    प्रेमियों के कीर्तन की तरह।

    और जब हालात बहुत ख़राब हो गए

    एक-दूसरे की आँखों में कूदकर

    ज़ोर से भीच लीं उन्होंने आँखें।

    इतनी ज़ोर से

    कि लपटें जब पलकों को छूने लगीं

    उन्हें महसूस तक नहीं हुआ।

    अंत तक उनमें से झाँकतो रही बहादुरी

    अंत तक उनमें से झलकती रही वफ़ादारी

    अंत तक वे दिखते रहे

    चेहरे की कगर पर ठहरे दो बूँदों की तरह।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 327)
    • रचनाकार : ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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