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दियासलाइ

diyaslai

मधुकर गंगाधर

मधुकर गंगाधर

दियासलाइ

मधुकर गंगाधर

और अधिकमधुकर गंगाधर

    काठक टुकड़ी

    छोट-छोट, उजर पियर

    चालीस अछि

    छोट-छोट गोल माथ

    बारुदक कारी धुत्त

    जेना आदम युगक नाँगट लोक

    शैल-गह्वरमे सुतैत छलाह

    गद्द मद्द।

    काठक बकसीमे

    सूतल अछि काठी सब

    ऊपर लपेटल अछि कागत रंगलाहा सन

    मोहर मार्कापर

    लाल लाल आखरमे पैघ-पैघ लिखल अछि

    मैच फैक्टरी कटिहार।

    जेना मनुक तख्तीमे

    शंकरक कील ठोकि

    व्यास और तुलसी केर

    ठोकल पीटल बाकसमे

    जकड़ल अछि मानव

    लपटल अछि ऊपरसँ

    जर्जर इतिहास

    मृत्यु जकाँ मानव

    मेड इन अज्ञात

    तत्व आर श्रम मिलल

    बुद्धि

    चेतना मिलल

    बनि गेल कठकी

    दियासलाइ

    नान्हि नान्हि काठीमे

    भरल छै विद्रोह

    चिनगी भरल जेना

    मनुकेर बेटामे

    पाव भरि माथामे

    पसेरी भरि आगि भरल

    जखन घसैत अछि

    छोट छिन माथ अपन

    मृत्युक नील परदा अपन

    आागि लहकि जाइत अछि

    छोट छिन माथ अपन

    मृत्युक नील परदा अपन

    आगि लहकि जाइत अछि

    अन्हरिया धधकैत अछि

    आउर लिखैछ

    अप्पन देह जरा

    अप्पन विकास-कथा

    क्षणिक इजोतमे

    कतेक विकास भरल।

    मनु जरै छथि

    याज्ञवल्क्य अबै छथि

    तुलसी विद्यापति

    अपन राग गबै छथि

    निमिषक ज्योतिमे

    अही ढङे माटिमे

    फूल सब फुलाइ अछि

    नऽव नऽव, केहन केहन

    मनुख मात्र पाँच फुटक

    मुट्ठी भरि हाड़-चाम

    मुट्ठी भर मांस आर

    छोट छीन माथ अछि

    जीति लेलक अम्बर (केँ)

    जहिना कठकी—

    जंगलमे आगिसँ

    माटि पकबैत

    रचलक अटारीकेँ

    लौहा गलबैत फेर

    बझबै लै चलल चान

    माटिक मनुक्खकेँ

    धुआँ केर पाखि लगा

    पाखी बनौलक (ओ)

    स्रोत :
    • पुस्तक : मैथिलीक नव कविता (पृष्ठ 118)
    • संपादक : रामकृष्ण झा ‘किसुन’
    • रचनाकार : मधुकर गंगाधर
    • प्रकाशन : राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला समिति, सुपौल (बिहार)
    • संस्करण : 1971

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