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धिक्कार अछि, धिक्कार

dhikkar achhi, dhikkar

रामकृष्ण परार्थी

रामकृष्ण परार्थी

धिक्कार अछि, धिक्कार

रामकृष्ण परार्थी

और अधिकरामकृष्ण परार्थी

    हमरा समाजक साहित्य के लिखत

    बड़ गूढ़ प्रश्न अछि हमरा लग ठाढ़

    जखन कि हमर बंधु-बांधव सभ

    पुरस्कार-सम्मानक लोभमे बनल अछि चाटुकार

    हिनका सभकेँ कनिको नहि चिंता छनि

    अपना समाजक

    जे अदौ कालसँ छैक मनुवादी व्यवस्थासँ संत्रस्त

    सभ सदिखन रहैत अछि

    मंच-माला-पाग लेल अनुरक्त

    किनसाइत

    एहने स्वार्थी लोक लेल कहने रहथिन बाबा भीम

    अनपढ़ लोक नहि अछि समस्या हमरा समाज लेल

    समस्या अछि त' पढ़ल-लिखल लोक

    जे गलतकेँ सही कहबामे क' रहल अछि

    अपन बुद्धिक उपयोग

    मुदा तइसँ की

    हिनका सभकेँ त' बनबाक छनि महान

    करेबाक छनि इतिहासमे दर्ज अपन नाम

    चाहे आबयबला पीढ़ी बनल रहैक सभदिन गुलाम

    हिनका सभकेँ चाही साहित्य सम्मेलनमे मंच पर स्थान

    मुदा कायरकेँ इतिहासो कहाँ करैत छैक स्वीकार

    मिरजाफरकेँ ओहिना नहि कहल जाइत छैक अंग्रेजक सियार

    ओहो हिनके सभ जकाँ छल समाजक गद्दार

    एहेन गद्दार साहित्यकार सभकेँ

    धिक्कार अछि, धिक्कार!

    स्रोत :
    • पुस्तक : विद्रोही बसात (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : रामकृष्ण परार्थी
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2024

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