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धौजनि सहैत कविता

dhaujani sahait kavita

रघुनाथ मुखिया

रघुनाथ मुखिया

धौजनि सहैत कविता

रघुनाथ मुखिया

और अधिकरघुनाथ मुखिया

    जखन कविता लिखैत कविकेँ

    हठात मोन पड़ि जाइत होनि

    पन्द्रह तारीख

    जाहि दिन देबाक हो

    मकानक किराया, बिजुरीक बिल

    अपन भोजन-भात

    तेल-साबुन, पाकिट खरच

    घर-पलिवार

    आ, भरि मासमे

    काज भेल हो

    बापक हुरिया

    तखन सद्यः

    कविता, कविता नहि बनि पबैत हेतै

    कलम अपन मोसिक रंग

    बदलि लैत हेतै

    आखर, कुआखर

    भाषा, कुभाषा भऽ जाइत हेतै

    मुदा, हरसट्ठे कविक मोनकेँ

    किएक नहि गछारि लेतै

    बाँसकेँ गछारने

    लऽतक लत्ती जकाँ

    भोरे-भोर फोन भेल

    जेठका बेटा संग गप्प जे

    पप्पा! स्वेटर चप्पलक बिना

    एहि जाड़मे कोना जेबै इसकूल

    आ, छोटकी बेटीक आवाज सुनाइ पड़ल हो जे

    छोटू भाइजी रे

    तोहूँ कहि दहीक ने पप्पाकेँ

    आ, हमरो लऽ कहि दिहैक

    जीन्स जैकेट लेने आबै लऽ

    हमरा कानोमे जाड़ होइ छौ भाइजी

    एकदम्म स्पष्ट सुनाइ पड़ल हो

    पत्नीक द्वारा धियापुताकेँ डाँटब

    कुहरिकऽ बाजब जे

    कनकन्नीसँ बामा हाथ नहि उठैए

    आ, जेठकी बेटीसँ मँगने हो पानि

    ओना कहै छथिन समीक्षक लोकनि

    कलाकार तँ वैह छी जे

    भुखलो पेट रहि

    मंचपर छप्पन प्रकारक भोजनक

    ढेकार कऽ

    श्रोताकेँ रिझा लैछ

    हा, रंगकर्मी लेल सम्भवो छै

    एतबे कालमे कवि जीक

    मोबाइलक बैलेंस भऽ गेल हो शून्य

    तखन, कहू तँ अहीँ सभ

    कविजी अगिला समाचार सुनबा लेल

    मोबाइलमे बैलेंसक ओरिओन करताह

    कि कविताक तानी-भरनी लेल

    शब्दक ओरिओन

    की कऽ पेताह

    एहना स्थितिमे

    कविताकेँ पकिया

    कुकविता वा अकविता

    बनि जेबाक सम्भावना

    हेतै की नहि

    अथवा कविताकेँ

    धौजनि सहऽ पड़तै की नहि?

    स्रोत :
    • पुस्तक : झुझुआन होइत गाम (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 126)
    • रचनाकार : रघुनाथ मुखिया
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2018

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