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देखल दिल्ली

dekhal dilli

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

देखल दिल्ली

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    (1)

    दिल्ली मन्दिर मिथ्याक थिक वा,

    पतित पाप केर अंश

    देव देश के राजधानी ई,

    केवल दैए दंश।

    बहुत वर्षसँ आबैत रहलहुँ,

    कहू ने की लऽ जाइ छी?

    कतेक ऊघू फूँसिक मोटा,

    से सोचि-सोचि झमाइ छी॥

    (2)

    सत्यक रहय प्रतीक्षा पल-पल,

    छुटितय दिग्भ्रम मोनक

    हृदयग्राही देखि मेटबितहुँ,

    तृष्णा हृदयक कोनक।

    घटना जे दैनिकमे छापल,

    वा टी. भी. प्रापक अछि

    प्रतिपल घटना पर्दाक पाछूक,

    ताहूसँ त्रासद अछि॥

    (3)

    भागम-भाग मचल चारुभर

    लगय भीड़ भागल अछि

    जीवन-दर्शन सभके सभक्यौ,

    ठकहि पर लागल अछि।

    ठकहि टा ले लोक पढैए,

    सीखैए, सिखबैए

    ठकहि टा ले लोक चलैए

    नाचैए, नचबैए॥

    (4)

    ठकहि टा ले बहुरुपिया सब,

    नाना धाति धरैए

    ठकहि टा ले प्रतिनिधि लोकक

    झुनझुना बजबैए।

    छीना झपटी, खून, फिरौती,

    के अनधुन व्यापार

    टैक्सी, बसमे बेबस बेटीक,

    बेइज्जति, बलात्कार॥

    (5)

    (एत’) माइक कोरमे नेना भुटका,

    भरि दिन भीख मङैए

    ताहूसँ छेटगर तँ औंठएँ,

    प्लेटक अँइठ चटैए।

    एहिठाम जे बनल महल अछि,

    केवल फूँसि-अखाड़ा

    एहिठाम काठहु के हाँड़ी,

    चढ़य आँच दो-बारा॥

    (6)

    एहिठाम गलथोंथीक बल पर

    फुंसिअहि सत्य बनैए

    एहिठाम बलथोंथी कऽ केओ,

    ऊँच मचान पबैए।

    एहिठाम केर गत्र-गत्रसँ,

    लाजहु कतहु पड़ायल

    नीति, नेत कि एतऽ तकै छी,

    वाहन सींघ बिलायल॥

    (7)

    (आब) गाँव तकैत छी, तँ गमैत छी

    'जेठकी जकर छुलाहिऽ,

    कहबी छैके, छोटकी तकर

    भाँड़हि लागल खाहि।

    (8)

    देश दशा कि हाय!

    पुनि लोकहिं करओ उपाय!!

    (9)

    नओ-नओ गाही पुरुख-देवान,

    नब्बे हाथ नाम फरमान

    देखू दिल्ली बाबू-भैया,

    'पन्द्रह पाइ' के एक रुपैया॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 73)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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