दाम्पत्य के एक दशक

dampatya ke ek dashak

नताशा

नताशा

दाम्पत्य के एक दशक

नताशा

और अधिकनताशा

    अनमने दिन की पीठ पर चलते हुए

    लौटते हो थककर छाँव की तलाश लिए

    तब भी काग़ज़ पर घिसे शब्द

    अपलक निहारता तुम्हारी ओर

    —देखो तो! कैसा लिखा है?

    घड़ी की सूई भी जब हो रही एकमेक

    तब भी अपने वितान में उलझा मेरा मन

    गर्दन के स्पर्श को झटक देता है

    कमरे के उनींदे उजास में

    बेआवाज़ बिखर जाते तरंगित स्पर्श

    सर्द से जड़ हो जाते कामनाओं के दूत

    मेरे व्यस्ततम क्षणों में उबासी के लिए जगह है

    थकान और नींद के लिए भी

    अपराधबोध का यह बोझ

    दिन-ब-दिन मेरे कंधे के दर्द को बढ़ाता है

    जब तुम याद दिलाते हो

    कि मैं भूल गई हूँ प्रेम करना शायद!

    मैंने कई रोज़ से झाँका नहीं

    उन आँखो को जो कभी आइना हुआ करती थीं

    भरा नहीं हथेलियों में तुम्हारा चेहरा

    पता नहीं कब से

    इतनी बार में

    तो प्रेमी भी चुन लेते विकल्पों की राह

    प्रेमिका की चौखट से लौटकर

    हृदय की साँकल में उलझी उँगलियाँ

    देर तक रहतीं

    प्रतीक्षारत उधेड़बुन में...

    इसलिए,

    कि देह की उपस्थिति

    हाथ बढ़ाने की दूरी भर है

    और प्यास के बहुत क़रीब है

    सोते का मीठा जल

    कोई जल्दी नहीं रहती प्रेमालापों की

    इस आश्वस्ति में महीनों बीत जाते हैं

    नहीं लिखती स्त्रियाँ पतियों पर कविताएँ

    इस बात को याद रखकर भी मैं लिख रही

    कि उनके नायक सदैव प्रेमी ही रहे

    प्रेम-कहानियों से गुमशुदा होते ये पात्र

    ताउम्र खलनायक होते रहे दर्ज

    फिर भी...

    स्रोत :
    • रचनाकार : नताशा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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