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चीज़ें भटकती रहती हैं

chizen bhatakti rahti hain

अनुवाद : शायक आलोक

जोशुआ जेनिफर एस्पिनोज़ा

जोशुआ जेनिफर एस्पिनोज़ा

चीज़ें भटकती रहती हैं

जोशुआ जेनिफर एस्पिनोज़ा

और अधिकजोशुआ जेनिफर एस्पिनोज़ा

    कैलिफ़ोर्निया एक रेगिस्तान है और मैं इसमें रहती एक स्त्री हूँ।

    सामने जाती सड़क एक ओर मुड़ जाती है और मैं अपने ही भीतर लड़खड़ा उठती हूँ।

    मैं भरी हुई हूँ ख़राब भावनाओं से, भयानक विचारों से, विनाश के दु:स्वप्नों से

    और इतने सारे प्रेम से जो अब तक अनकहा है।

     

    क्या बुध वक्री है? कोई पूछता है।

    कोई जवाब देता है—नहीं, लेकिन वैसा ही कुछ और।

    वैसा ही कुछ और—

    वही तो मेरा नाम होना चाहिए।

     

    जब तुम मुझसे पूछो कि क्या सचमुच मैं एक स्त्री हूँ, एक मनुष्य,

    एक सुसंगत पहचान, तो मैं कहूँगी—नहीं, लेकिन वैसा ही कुछ और।

     

    पृथ्वी ग्रह का एक सच्चा नागरिक आँखें मूँद लेता है

    और बताता है कि वह क्या है आईने के सामने।

    एक अच्छा मनुष्य बस देता है और बदले में कुछ नहीं माँगता।

    मैं देती हूँ और माँगती हूँ बस एक चीज़—

     

    सुनो मुझे। सुनो मुझे। सुनो मुझे। सुनो मुझे। सुनो मुझे।

    सुनो मुझे। मेरी आवाज़ का भार अपने भीतर उठाओ

    और यह मत भूलना—

    चीज़ें भटकती रहती हैं। चीज़ें मारे जाने के बहुत बाद तक भी

    मौजूद रहती हैं।


    स्रोत :
    • रचनाकार : जोशुआ जेनिफर एस्पिनोज़ा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित

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