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छीता की यँडुरी

chhita ki yanDuri

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

छीता की यँडुरी

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    यँडुरी रेंगि चली,

    छीता की पँडुरी रेगि चली।

    फेंकिसि सिंधु ढकेलिसि बौझड़ु

    घिरे अगासी गगरा,

    गरज तरजि के रोवइ लागे

    भुँइ पर जीवनु डगरा।

    दसौ दिसा हरियाइ उठीं

    आनंदु चहूँधा बिखरा

    खग-मृग बिरिछ अँगौछिनि देहीं

    बिहँसि उठा बनु सिगरा।

    गलियारन म्याँढन, खाँहिन पर

    बगियन मा, बिरवन पर,

    ऐंठि-ग्वैठि सैकरन पगन ते

    भागी गली-गली।

    यँडुरी रेंगि चली।

    कहूँ अकेलि, कहूँ तर-उप्पर

    बड़ी मौज मा घूमइँ,

    ऊबड़ खाबड़ सब कहुँ बिचरइँ

    सबकी च्वटिया चूमइँ।

    ना परवाह तनिक भोजन की

    ना घरवार कि चिन्ता,

    महा अहिंसक खरु ना खोंटै

    माटिनि खाये झूमइँ।

    बड़ी लजोलु बड़िनि खिसियौनी,

    छुवइ देइ ना देहीं

    छुये लजाइ, तुरत मुँह झाँपइ

    भोली, बड़ी भली।

    येंडरी रेंगि चली।

    गंडै गंडा अंग अलग सब

    ड्य्ब्बै-ड्यब्बा जोरी

    बड़े गिनइया गिनि ना पाइनि

    पहिया लाख करोरी।

    तनिकु सरा मुँह चीकन-चीकन

    लाग सूपु अस आगे

    बिनु पटरी, बिनु क्वैला पानी

    लागि चलै जिउछोरी।

    मनु आवै तब रुकै, टीसनि

    पानिउ मैहाँ घुसरै

    कही चीलगाड़ी जहाजु या,

    या गाड़ी नकली

    यँडुरी रेंगि चली।

    27.6.1960 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 60)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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