Font by Mehr Nastaliq Web

चेतना-तरंग

chetna tarang

आरसी प्रसाद सिंह

आरसी प्रसाद सिंह

चेतना-तरंग

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    छूबि गेल आइ कोन चेतना-तरंग?

    प्राण-प्राणमे सजीव भऽ रहल उमंग!

    नाचि रहल बऽन बाध, बागमे विकास;

    सोनजुही-ठोर पर ऋतु वसन्त-हास!

    फूलि गेल लाल-लाल फूल-तन पलाश।

    नव किरणक कनक हरिण धाँगि रहल घास।

    स्वर-सुगंधसँ बिभोर विकल अंग-अंग।

    छूबि गेल आइ कोन चेतना-तरंग?

    आइ मलय-वाल-गात मातल रसराज।

    कुंज-कुंज पुंज-गुंज भ्रमर-साज।

    लजवन्ती-लतिकामे जनमि रहल लाज।

    आइ ने सोहाइ कोनो आँगन घर-काज।

    रंग-मंच पर उतरि गेल नट अनंग।

    छूबि गेल आइ कोन चेतना-तरंग?

    आइ हाथमे हमर मन, अवश प्राण।

    पात-पात पर चढ़ल रूप-कुसुम-बाण।

    बूढ़ो-पीपर भऽ गेल अछि जुआन।

    रेशम-सन पहिरि नऽव पल्लव परिधान।

    चहकि रहल डारि-डारि पर गुणी विहंग।

    छूबि गेल आइ कोनो चेतना-तरंग?

    अधरतिए चूबि महुआ मधु-जोर।

    अंजुरी भरि गाबि रहल चैती धुन भोर।

    कोइली कुहु कुहुक बोल, पपिहा पी-शोर।

    रक्तमे जुआड़ि, रोम-रोममे हिलोर।

    भासल जा रहल पयर कतऽ ककर संग?

    छूबि गेल आइ कोन चेतना-तरंग?

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 9)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY