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चमक न पाई मैली चादर

chamak na pai maili chadar

नंद लाल 'क़ैदी'

नंद लाल 'क़ैदी'

चमक न पाई मैली चादर

नंद लाल 'क़ैदी'

और अधिकनंद लाल 'क़ैदी'

    धुलते-धुलते शाम हो गई

    चमक न पाई मैली चादर।

    अब तो बदली भी घिर आई

    रात अंधेरी होती जाती,

    भय से काँप रहा तन जर-जर,

    सूख गया गागर में सागर

    चमक न पाई मैली चादर।

    अब तो घाट अखरता रह-रह

    अपने पर होती नाराजी

    कुंठित हुए कुढ़न को सह-सह

    अकल ठिकाने लगती उनकी

    जो बनते थे नाहर नागर

    चमक न पाई मैली चादर।

    आगे दिखती खड़ी बुढ़ापा

    उसके पीछे मौत हँस रही

    उसके आगे देख रहे हैं,

    डूब रही है पीढ़ी अपनी

    मुँह से नहीं फूट पाया है,

    अब तक एक सबद का आखर

    चमक न पाई मैली चादर।

    स्रोत :
    • पुस्तक : तार वीणा के सजा दो (पृष्ठ 7)
    • संपादक : मोहन सिंह
    • रचनाकार : नंद लाल 'क़ैदी'

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