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चलना एक प्रार्थना है

chalna ek pararthna hai

पूनम शुक्ला

पूनम शुक्ला

चलना एक प्रार्थना है

पूनम शुक्ला

और अधिकपूनम शुक्ला

    चौड़ी सड़क पर चलो

    या चलो कच्ची पगडंडी पर

    मैदान में

    या फिर किसी पहाड़ की घाटी में

    पर जब भी चलो

    चलो हवा की छुअन को महसूसते हुए

    उसकी थोड़ी-थोड़ी देर पर बदलती हुई गंध

    अपने नथुनों में भरते हुए

    पास के पेड़ों को, उनके पत्तों को, उनके फूलों को

    हवा में डोलता हुए देखते हुए

    आस-पास के पशु-पक्षियों पर

    अपनी दृष्टि फेरते हुए

    चलना कोई साधारण क्रिया नहीं है

    एक मूक दर्शक की तरह

    अगर चल पाओ तो चलो

    कि चलते-चलते ही प्रकृति

    पीछे से देती है आवाज़

    कि चलते-चलते ही

    कोई आवाज़ पैदा करती है क्षणिक विचार

    कि चलते-चलते ही

    कोई क्षणिक विचार ले सकता है आकार

    कि चलते-चलते ही

    इस मूक समय में

    कोई आकार जगा सकता है अंतर्नाद

    रख दो अपना मोबाइल दूर

    ईयर फ़ोन से मत बंद करो अपने कान

    चलो हवा की छुअन को महसूसते हुए

    कि चलना एक प्रार्थना है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : पूनम शुक्ला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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