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बुलेट वाली लड़की

bulet vali laDki

कुमार विक्रमादित्य

कुमार विक्रमादित्य

बुलेट वाली लड़की

कुमार विक्रमादित्य

और अधिककुमार विक्रमादित्य

    कोसी के धार के मध्य बने

    छोटी सी पुलिया

    और उस पर दौड़ती बुलेट से

    आती आवाज़ फट-फट-फट ने

    सहसा ध्यान खींच लिया

    देखा वह एक युवती थी

    जिसके कोमल हाथ ने

    एक्सीलेरेटर थाम रखा था

    भू से उठ रही ऊर्मि बार-बार

    ठोकर मार रही थी

    सुघर श्वेत शरीर पर

    पसीना को सोख रही थी

    उनकी नीली मखमली निकर

    लटें बिखर बना रही थी नागपाश

    तो कभी लट बिखर रही थी

    सुंदर मुख का दीदार करने

    बिना किसी संकोच के

    वह घूम रही थी पुरुषों के मध्य

    अपने कर्तव्य के प्रति सचेष्ट

    बीच-बीच में सिर हिलाती

    तो कभी फ़ोन से बात करती हुई

    सूरज की गर्मी को धता बताती हुई

    घूरती नज़रों को जवाब देती हुई

    रहा गया

    टटोला अपने अंतस को

    देखा उनके बुलेटी रफ़्तार और

    कर्त्तव्यनिष्ठटता के कारण को

    क्यूँ है इतनी सचेष्ट अपने कर्म के प्रति

    क्यों वह जूझती है पुरुषों से

    और बराबरी करती है उनसे

    तो पता चला

    वह है घर में सबसे बड़ी

    अपने छोटे भाईयों की जिम्मेवारी

    पिता के अरमान जो

    रह रहकर आती है शमशान से

    उन्हें भी पूरा करना है

    साथ ही पूरा करना है

    माँ की ज़िम्मेवारी

    और उतारना है अबलारुपी चोंगा

    जो पौरुषी उद्वेग के कारण

    उबाल ले रहा है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुमार विक्रमादित्य
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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