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बिखाह चाङुर

bikhah changur

रघुनाथ मुखिया

रघुनाथ मुखिया

बिखाह चाङुर

रघुनाथ मुखिया

और अधिकरघुनाथ मुखिया

    पड़ाइत जटायुक वंशजसँ

    भेंट भेल छल शान्त एकान्तमे

    अपसियाँत भागल जाइत देखि

    हम टोकलिअनि

    एक छन बिलमलाह

    आ, हमरा

    पड़ाइते-पड़ाइत कहि गेल

    हे महामानव

    अपनेक नित-निर्मित बिखाह वायुमण्डलसँ

    हमर वंश उपटि गेल

    कतेको डीह-डाबरपर

    बैगन-भट्टा रोपा गेलै

    हमर तँ प्राणे बाँचल अछि जे

    एहि अन्हरियोमे भागि रहल छी

    अपनेक छत्रछायासँ

    आ, हिआसि रहल छी ओहेन ठाँ

    जतय अपनेक जातिक आवागमन नहि हो

    ओना तँ हमरो मोन रहय

    मंगल चान

    मुदा ओतहु पहुँचि चुकल अछि अपनेक यान

    नदी फिरिये देने अछि

    यूरी गागरिन राकेश श्रीमान्

    आन कतेको ठाँ मुति घिनेने अछि अपनेक श्वान

    आब तँ ओतहु बना रहल छी अहाँ अपना लेल बस्ती

    हमर तँ दुखक नहि ओर

    मुदा, बचा सकब तँ बचाउ

    अहाँ अपन संततिकेँ

    अपने बिखाह चाङुरसँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : झुझुआन होइत गाम (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 31)
    • रचनाकार : रघुनाथ मुखिया
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2018

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