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भने व्यवस्था बदलि गेल हो

bhane vyavastha badali gel ho

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

भने व्यवस्था बदलि गेल हो

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    अन्तरिक्ष छूलहुँ तँ छूलहुँ, अन्तःकरण कहाँ बदलल अछि?

    भने व्यवस्था बदलि गेल हो, वातावरण कहाँ बदलल अछि?

    भूसुर जे कहबैत छला से, भुसुर-भुसुर सब खाय रहल छथि,

    क्षत्रियगण रक्षा की करता, छतरी तर सन्हिआय रहल छथि,।

    वैश्य समाजक भरण बिसरि सब, अपन उदर कुड़िआय रहल छथि,

    सेवा धर्म जनिक छल, मेवा पयबा लय अकुलाय रहल छथि।

    शोषण एखनहुँ धरि चलिते अछि, से आचरण कहाँ बदलल अछि?

    अन्तरिक्ष छूलहुँ तँ छूलहुँ, अन्तःकरण कहाँ बदलल अछि?

    कोँढ़-करेज खखोड़ि धरित्रीकेँ, सब खुक्ख बनाय रहल छी,

    करब नियन्त्रण एहि प्रकृति पर, से फुसिए सपनाय रहल छी।

    राखि आसुरी भाव हृदयमे, चारू दिस औनाय रहल छी,

    भोगक तृष्णासँ अन्हरायल, अपकर्मो अपनाय रहल छी।

    परखनलीमे जनमौलहु पर, जीवन-मरण कहाँ बदलल अछि?

    अन्तरिक्ष छूलहुँ तँ छूलहुँ, अन्तःकरण कहाँ बदलल अछि?

    तामल खेतक ढेप भने, चौकी दऽ समतल बना सकै छी,

    किन्तु समाज समान बनत से, सिद्धान्ते टा गना सकै छी।

    जन प्रतिनिधि बनि सभा मंचकेँ, भाषणसँ गन-गना सकै छी,

    किन्तु आब आश्वासनटासँ जन-मनकेँ नहि मना सकै छी।

    परमार्थक नामे टा लै छी, मिथ्याचरण कहाँ बदलल अछि?

    अन्तरिक्ष छूलहुँ तँ छूलहुँ, अन्तःकरण कहाँ बदलल अछि?

    संयम-नियमक बात चूल्हिमे, कंडोमेक प्रचार करै छी,

    बलात्कार-अपहरणक संगहि निर्भय भय व्यभिचार करै छी।

    भौतिक सुख पयबा लय प्रकृतिक, संगहि अत्याचार करै छी,

    थिक गणतन्त्र किन्तु जन-गणसँ, उनटे सब व्यवहार करै छी।

    वैज्ञानिक चिचिआथु प्रदूषित, पर्यावरण कहाँ बदलल अछि?

    अन्तरिक्ष छूलहुँ तँ छूलहुँ, अन्तःकरण कहाँ बदलल अछि?

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 386)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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