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बथानी में बरसात

bathani mein barsat

मिथिलेश श्रीवास्तव

मिथिलेश श्रीवास्तव

बथानी में बरसात

मिथिलेश श्रीवास्तव

और अधिकमिथिलेश श्रीवास्तव

    ज़ुल्म ढाती थी बरसात

    किसी सूखे सोते में जैसे आता है पानी

    बथानी के खर-पतवार और पुआल की छावनी से

    रिसने लगता पानी

    आँखें मीचते हुए हम हड़बड़ा कर उठते

    और बिस्तर को समेट लेते

    नींद में ऊँघते

    इस कोने से उस कोने

    विस्थापित होते रहते

    कंधे पर बिस्तरे को उठाए

    बरसात से हम नाराज़ नहीं होते

    वही हमारी नियति

    वही हमारी विरासत

    बरसात से हम नाराज़ नहीं होते

    नींद में ही हम बरसात का संगीत सुनते

    बहुत कर्णप्रिय होता था वह संगीत

    लोरियों सरीखा

    कि रात भर विस्थापित होते रहते और सोते रहते

    सुबह नींद पूरी हुई लगती

    बारिश बंद हो चुकी होती।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मिथिलेश श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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