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बचा रह जाता है दुख

bacha rah jata hai dukh

पूनम शुक्ला

पूनम शुक्ला

बचा रह जाता है दुख

पूनम शुक्ला

और अधिकपूनम शुक्ला

    हँसी के ठहाकों के बीच

    होठों से दुख

    थोड़ा-सा ऊपर उछलकर

    एक फ़व्वारे की तरह नीचे आता है

    और ली जानें वाली साँसों के साथ

    धीरे से दिल की गहराइयों में

    उतर आता है

    हँसती हुई आँखों की

    चमक के साथ

    दोस्ती के लिए

    बढ़ाता है अपना हाथ

    और धीरे से हमारे सपनों में उतर आता है

    सपनों में

    एक उड़नतश्तरी में बैठकर

    यहाँ वहाँ गश्त लगाता

    वह उतर आता है

    सूरज, चाँद, तारों के बीच

    जागने पर

    वह इस देह के भीतर

    पलटिया मारने लगता है

    और देह के नमक को

    आँसुओं में छिपा कर

    आँखों से गालों पर

    उतर आता है

    भीड़-भाड़, गाजे-बाजे

    और नई धुनों के बीच

    सुख को पटखनी देता हुआ दुख

    बिटिया की विदाई के वक्त

    उदास चेहरों के ऊपर

    उतर आता है

    पर इतनी कलाबाजियों के बाद भी

    हमें तपा कर

    बनाने के लिए कुंदन

    इस देह के भीतर

    थोड़ा-सा

    बचा रह जाता है दुख।

    स्रोत :
    • रचनाकार : पूनम शुक्ला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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