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आयातित दृष्टि

ayatit drishti

विशाल कुमार

विशाल कुमार

आयातित दृष्टि

विशाल कुमार

और अधिकविशाल कुमार

    हम क्या देखते हैं?

    इससे ज़्यादा ज़रूरी सवाल

    है—हम क्या नहीं देखते!

    जिसे देखते हैं,

    वह और भी दिखने लगता है।

    ज़ोरों से वह बार-बार

    अपने आप को दोहराता है।

    अपनी लहरों से हमें

    ले जाता है ज़मीन से कोसों दूर।

    कटकर उस ज़मीन से

    उसकी स्मृति भी नहीं बचती शेष।

    देखने और देखने

    के बीच में छोड़ देते हैं

    बहुत कुछ,

    जो बन जाता है अदृश्य,

    अदृश्य से भी ज़्यादा अदृश्य।

    दृश्यता के आवेश में

    मान लेते हैं उसे पूरा संसार।

    फिर जब दिखता है अदृश्य हमें,

    करते हैं हम उसका उपहास बार-बार।

    हम देखे हुए को देखने के आदी हैं,

    हमारे लिए बाकी सब इत्यादि है।

    इसलिए

    ज़रूरी है पूछना

    यह नहीं

    कि हम क्या देखते हैं,

    बल्कि

    हम क्या-क्या नहीं देखते!

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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