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आग

aag

आग जलती रहनी चाहिए,

हुँकार से, मृदंग-तलवार से;

हृदय में छुपे उस अँगार से,

जो जले तो सब राख हो,

जो जले तो सब आबाद हो।

आग जलती रहनी चाहिए,

शोर से, हुड़दंग से;

भोर की क्षैतिज किरण की जयकार से,

ऊँचे आकाश में शाँत चाँद से,

जो जगे अँधेरे से चेतन्य हो,

जो लक्ष्य भेद ऊँचे आकाश में जा स्थिर हो।

आग जलती रहनी चाहिए,

लकड़ी से, ईर्ष्या-द्वेष से;

धमनियों में दौड़ते रौद्र रक्त से,

शरीर की नश्वरता में आत्मबीज से,

जो क्षुद्रता का संहारक हो,

अनंत प्रेम का उपासक हो।

आग जलती रहनी चाहिए,

ताकत में लिप्त अहंकार से,

धरती की गोद से उपजे ईंधन से;

बोध से उपजे प्राण से,

ज्ञान से सुशोभित कर्मयोग से,

जो मन के लिए स्वच्छ गंगा हो,

चाहे सिंधु या ब्रह्मपुत्र;

जीवन-मुक्ति की राह बाट,

और अंत गहरा नीला समुद्र हो।

स्रोत :
  • रचनाकार : कंचन बुटोला
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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