Font by Mehr Nastaliq Web

अपने हिस्से का पहाड़

apne hisse ka pahaD

मोहित नेगी 'मुंतज़िर'

मोहित नेगी 'मुंतज़िर'

अपने हिस्से का पहाड़

मोहित नेगी 'मुंतज़िर'

और अधिकमोहित नेगी 'मुंतज़िर'

    अल्पायु में ब्याही गई

    उनकी माँएँ

    उन्हें छोड़ने आई हैं सड़क तक।

    सुबह की पहली बस से,

    वे नवयुवा जा रहे हैं

    रोज़गार की तलाश में

    शहरों की ओर।

    वे जा रहे हैं छोड़कर

    अपने चारों और के

    ऊँचे पहाड़

    गहरी नदियाँ

    सर्पिलाकार पगडंडियाँ

    उफनते गधेरे

    सीलन भरी घाटियाँ

    पिताओं के सीढ़ीदार खेत

    मगर वे लेकर जा रहे हैं

    अपने अंदर

    अपने हिस्से का पहाड़

    जब वे

    दिनभर की थकान से

    चूर होकर

    लौटेंगे

    अपने काम से

    अपने किराए के कमरों की ओर

    और निढाल होकर लेटेंगे अपने बिस्तर पर

    तब बंद करते ही आँखें

    उन्हें नज़र आएगा

    अपने हिस्से का पहाड़

    उसके गगनचुंबी शिखर

    उफनते गधेरे,

    और ढ़लानों पर गीत-गाती

    घसियारिने

    और फिर वे रो पड़ेंगे

    उस घुप्प अँधेरे में

    बहुत देर तक

    और जाने कब

    उन गर्म आँसुओ की तपन से

    वे खो जाएँगे

    नींद के आग़ोश में

    सुबह उठने पर वे फिर ढोएँगे

    अपने हिस्से का पहाड़

    काश! वे लौट पाएँ

    वापस

    अपनी जड़ों की ओर

    अपने घरों की ओर

    वरना वे किसी दिन

    ढोते हुए मर जाएँगे

    अपने हिस्से का पहाड़।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मोहित नेगी 'मुंतज़िर'
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY