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अन्यथा!

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गरिमा सिंह

गरिमा सिंह

अन्यथा!

गरिमा सिंह

और अधिकगरिमा सिंह

    ईश्वर से मांगा

    वंश चलाने वाला बेटा

    लेकिन तुम हुई

    हमने लक्ष्मी माना तुम्हें

    शक्ति मानकर भी किया कन्या-पूजन

    लेकिन तुम पराया धन हो

    इसलिए अपनी सीमाओं को

    पहचान लो तो अच्छा है

    तुम्हारे भले की बात है

    देखो, अन्यथा मत लेना!

    लैला-मजनूँ, हीर-राँझा, शीरी-फ़रहान की

    मुहब्बतों से भी ऊँची है

    अपनी मुहब्बत

    आत्मिक है

    और कुछ शरीरी भी

    सत्ता हमला कर रही है

    हर शुभ और कोमलतम पर

    हमें बचाना है इस कोमलतम को

    इसलिए हमारी मुलाक़ातें बहुत ज़रूरी हैं

    प्रेम की पराकाष्ठा है हमारा मिलन

    तुमने आज मेरी आत्मा को जगा दिया है

    मेरा प्रेम, मेरी निजता की

    तुम पूर्ण परिभाषा हो

    मत रहा करो परेशान

    दुनिया मुझे निचोड़ लेना चाहती है

    मैं अब थका हुआ व्यस्त इंसान हूँ

    एक वैकल्पिक दुनिया का निर्माण स्वप्न है मेरा

    दुनिया को किताबों से देखो और समझो

    थोड़ा और बौद्धिक बनो

    अपनी सारी इच्छा, प्रेम, वासना समर्पित कर दो इसे

    तुम मुझे वहीं पाओगी—

    हमेशा तुम्हारे साथ

    कल बात करते हैं

    देखो, अन्यथा मत लेना!

    तुम अर्धांगिनी हो मेरी

    सात फेरे और सिंदूर—दान के बाद

    बनी हो मेरी

    मेरा सुख-दु:ख अब हमारा है

    जानता हूँ कि तुम्हें

    साड़ी पहनना और सर ढकना अच्छा नहीं लगता

    लेकिन घरवालों के सामने

    उनका दिल रखने के लिए

    ढक लिया करो अपना सर

    हाँ, मुझे पता है कि तुम्हें

    अभी अपनी नौकरी में जमना है

    लेकिन माँ का दिल रखने के लिए

    कर लेते हैं एक बच्चा

    इतनी देर क्यों हो गई तुम्हें

    तुम, करो अपनी नौकरी

    लेकिन बच्चे की परवरिश भी तो ज़िम्मेदारी है

    तुम, इतनी नौकरी में उलझी हो कि

    कि दोस्तों के यहाँ ना जा सकती हो

    ना वो सकतें हैं

    तुम छोड़ क्यों नहीं देती नौकरी

    आख़िर तुम घर पर रहती ही क्यों हो

    जब तुम्हें यहाँ कोई काम ही नहीं करना

    तुम कहीं और जाकर क्यों नहीं रहती

    चलो, खाना लगाओ

    देखो, अन्यथा मत लेना

    स्रोत :
    • रचनाकार : गरिमा सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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