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घोड़ा

ghoDa

अनुवाद : किंशुक गुप्ता

लुइज़ ग्लुक

और अधिकलुइज़ ग्लुक

    वह घोड़ा तुम्हें ऐसा क्या देता है

    जो मैं नहीं दे सकती

    मैं तुम्हें अकेला देखती हूँ,

    जब तुम डेयरी के पीछे खेतों में जाते हो,

    किस तरह तुम कसकर थामे रहते हो

    घोड़ी की अयाल

    तब मुझे तुम्हारी चुप्पी का रहस्य समझ आता है :

    तिरस्कार, घृणा मुझसे, शादी से। फिर भी,

    तुम चाहते हो मैं तुम्हें छूऊँ; तुम रोते हो

    बहुओं जैसे, पर जब मैं तुम्हें देखती हूँ तो पाती हूँ

    तुम्हारे शरीर में कोई बच्चा नहीं।

    तब वहाँ क्या है?

    कुछ भी नहीं। सिर्फ़ जल्दी

    मुझसे पहले मरने की।

    सपने में मैंने तुम्हें वीरान खेतों में घुड़सवारी करते देखा

    फिर तुम उतर गए : दोनों साथ चलते हुए;

    अँधेरे में तुम्हारी कोई परछाईं नहीं।

    क्योंकि परछाइयाँ अपनी मालिक ख़ुद होती हैं

    और रात में कहीं भी जा सकती हैं,

    मुझे लगा वे मेरी तरफ़ बढ़ रही हैं।

    मेरी तरफ़ देखो। क्या तुम्हें लगता है मैं नहीं

    समझ सकती?

    इस जानवर से क्या आशय

    अगर जीवन से जाने का रास्ता नहीं?

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : लुइज़ ग्लुक

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