कविजी विचारधाराक खाद-पानिसँ
संपुष्ट राखय चाहैत छथि
अपन पुरखाक रोपल अंधविश्वासक गाछकेँ
जे भ' गेल छैक आब ठुट्ठ पत्रहीन
ओ उगाबय चाहैत छथि
फेरसँ ओहि गाछपर पाखण्डक पनुगी
आ आडम्बरक फूल-पात
आर तोड़' चाहैत छथि
अंधविश्वासक फल
फल जे आम आदमीक लेल छैक माहुर
आ हुनका लेल छनि देवाहार
एहि फलकेँ खयबाक कल्पना मात्रसँ
हुनका मोनमे उत्पन्न भ' जाइत छनि
शोषण, दमन, उत्पीड़नक विचार
जागृत भ' जाइत छनि
छल, प्रपंच, षडयंत्र बला सभ संस्कार
आबि जाइत छनि जातीय अहंकार
आ सोचय लगैत छथि
मात्र हमहीं टा छी मानवक तारणहार
ओ धर्मक चश्मा पहिरने
निहारैत छथि बेर-बेर अंधविश्वासक गाछ
जे एखनो छैक ठुट्ट आ पत्रहीन
कतौसँ कोनो कनोजरि नहि निकलैत देख
ओ भ' जाइत छथि खिन्न
आ फेर डूबि जाइत छथि आकंठ
ढोंगी सभ्यता आ ठकफूसियाही संस्कृतिमे
छल-प्रपंच-षड्यंत्रक पोथीमे
आह! कतेक नीक छल
हमर पुरखाक इतिहास
बिनु मेहनतियेकेँ मिलि जाइत छलनि
हुनका सभकेँ छप्पन भोगक थार
लोकदेवता मानि लगबैत रहैत छलनि
जय-जयकार
आब कहाँ रहल ओ समय
आब अछि त' मात्र चारू दिस उपहास
मुदा कविजी नहि मानैत छथि हारि
कियैक त' यैहे गाछ छनि हुनकर
भूत-भविष्य आ वर्तमानक आधार
ओ भाषा-साहित्यसँ मजगूत करय चाहैत छथि
ओहि गाछक जड़िकेँ
ओ कथा-कवितासँ पनुगाबय चाहैत छथि
ओहि गाछक कनोजरिकेँ
मुदा हुनकर सभ परिश्रम भ' जाइत छनि बेकार
कियैक त' आब माटिओकेँ नहि छैक
एहि तरहक माहुरक गाछ स्वीकार
एहि तार्किक समय आ विवेकी बसातमे
जेना-जेना भ' रहल छैक ओ गाछ अस्तित्वविहीन
तहिना-तहिना कविजीक पैरसँ घसकि रहल छनि जमीन।
- पुस्तक : प्रतिकार एखन बाँकी अछि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 55)
- रचनाकार : रामकृष्ण परार्थी
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
- संस्करण : 2022
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