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अकेले मेड़ की टिटहरी

akele meD ki titahri

रवि यादव

रवि यादव

अकेले मेड़ की टिटहरी

रवि यादव

और अधिकरवि यादव

    रात कुछ काली नहीं थी

    बल्कि कुछ बादल घेरे हुए थे चाँद को

    जिसमें वह खेलता हुआ भयावह लग रहा था

    ख़ाली खेत के सन्नाटे में सुनाई दे रही थी झींगुर

    और उस मौसम में अचानक निकल आने वाले मेंढकों की आवाज़

    जुलाई की रात का कोई भरोसा-सा नहीं लगता

    कब वह बरसने लग जाए

    ऐसे में टिटहरी लगाती रहती है चक्कर गाँव के

    उसकी आवाज़ को किसी ने नहीं समझा

    कब वह रो रही और कब हँस रही

    केवल एक कहतूत में उसकी आवाज़ समझते रहे लोग

    कुछ अपसकुन होने का

    बारिश की रात बढ़ रहा था पानी

    कुछ कुछ उपरौछा-सा बहना हो रहा था शुरू मेड़ के

    टिटहरी गस्त लगाकर चिल्ला रही थी

    अपने अंडों के बचाव के लिए

    उस रात बारिश में

    अकेले मेड़ की अकेली टिटहरी का परिवार ख़त्म हो गया

    नहीं बच सका कुछ

    अब उस मेड़ पर उगी हुई है हरी घास

    जाने कितनी वारदातों को छिपा लिया है घास ने

    टिटहरी अब भी नहीं भूल सकी है उस दिन की बात

    इसलिए चिल्लाती रहती है गाँव के आस पास

    हर रोज़ रात को

    स्रोत :
    • रचनाकार : रवि यादव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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