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अजब

ajab

अजब रंग है अजब दृश्य

अजब हवा है अजब शहर

अजब लोग

एक पल होता है होने के दौरान

समूचा वक़्त

रात औरत सितारों रोशनियों से भरा

एक शहर होता है मेरे मन में

आ! उमड़ती हुई धार

मुझे ले चल

मैं कहता हूँ

मैं गाता हूँ

अपने पाप का गीत

पुण्य की कथा

लिखता हूँ

अजब लिखावट की

अजब चित्रमयता में

बनता हूँ एक गाछ

हरा प्रसन्न और इच्छाओं से भरा

शहर बनता हूँ

मैं शायद उसी पल

शायद आसमान

जो नरम गुलाबी बिजलियों में

हल्के-हल्के काँपता

धरती को छू रहा है

मैं बनता हूँ

हवा की उंगलियाँ

आ, मेरे पास

और लिपट जा

मैं कहता हूँ अपनी औरत से

अँधेरे में, गाढ़े अँधेरे में

अपनी मौत के आख़िरी सिरे पर

मैं बनता हूँ एक नया शरीर

अजब है,

अजब है यह शरीर!

स्रोत :
  • रचनाकार : प्रभात त्रिपाठी
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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