अभिनेता

और अधिकविपिन कुमार अग्रवाल

    आधे पल में एक सदी देखकर

    नींद के अँधियारे से मैंने झाँका तो

    कमरा सनीमे के दृश्य-सा सज़ा था जिसमें

    एक बड़ा चेहरा सफ़ेद-सा चमक रहा था

    उठकर बैठा तो अपना बदन बेहद चिपटा लगा

    अरे यह तो साँस लेने से भी नहीं फूलता

    अलग होने की हर कोशिश नाकामयाब होती जा रही है

    मारे अँधविश्वास के ये दुनिया वाले समझते हैं

    कि इनकी तरह मैं भी भाग्यवश सचमुच

    बहुत-सी जड़ स्थितियों का सिलसिला हूँ

    तमाम मनोरंजन भरी नज़रें मुझे हर बार धक्का दे

    नायक की जगह पर चिपकाती जा रही हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : नंगे पैर (पृष्ठ 55)
    • रचनाकार : विपिन कुमार अग्रवाल
    • प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन
    • संस्करण : 1970

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