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आवेग, जिन्हें केवल वे ही अब भी प्रेम कहते हैं

aaveg, jinhen keval ve hi ab bhi prem kahte hain

अनुवाद : शायक आलोक

पॉल वेरलेन

पॉल वेरलेन

आवेग, जिन्हें केवल वे ही अब भी प्रेम कहते हैं

पॉल वेरलेन

और अधिकपॉल वेरलेन

    आवेग, जिन्हें केवल वे ही अब भी प्रेम कहते हैं

    वे भी प्रेम ही हैं—कोमल भी, उन्मत्त भी

    अपनी कुछ विलक्षण विशेषताओं के साथ

    जो निश्चय ही रोज़मर्रा के प्रेमों में नहीं मिलतीं।

     

    वे उनसे भी बढ़कर, उनसे भी अधिक साहसपूर्ण 

    वे आत्मा और रक्त की ऐसी दिप्तियों से आलोकित हैं

    कि उनकी तुलना में दुनियावी चलन के प्रेम

    बस हँसी-खेल या दैहिक आवश्यकताएँ भर प्रतीत होते हैं

    खोखली उक्तियों, दुलार में बिगड़े बच्चों की तुच्छ ज़िदों जैसी।

     

    —“आह! वे बेचारे साधारण, पशुवत् प्रेम

    वे तथाकथित ‘सामान्य’ प्रेम!

    स्थूल वासनाएँ या क्षणिक क्षुधा भर

    और साथ में मूर्खता और संतानोत्पत्ति का सारा गर्व!”

     

    ऐसा वे कह सकते हैं जिन्हें किसी उच्च दीक्षा ने अभिषिक्त किया है

    जिन्होंने सुख की पूर्णता को प्राप्त किया है

    और अपनी कामना की उस असीम प्यास को भी

    जो उनकी अटूट निष्ठा को धन्य बनाती है।

     

    पूर्णता! वे उसे उसकी चरम सीमा तक प्राप्त करते हैं—

    तृप्त और परिपूरित चुंबन, अनुगृहीत हाथ

    एक-दूसरे को लौटाए गए स्पर्शों की समृद्धि में

    और अंत में वह दिव्य आत्म-विलय!

     

    क्योंकि वे सबल हैं और शक्ति का अभ्यास 

    उन्हें प्रेम-विलास में अजेय बना देता है।

    कितना प्रचुर, कितना रसपूर्ण, कितना उमड़ता हुआ है वह प्रेम-आनंद!

    हाँ, मुझे पूरा विश्वास है—उन्होंने सचमुच पूर्ण परिपूर्णता पा ली है।

     

    और अपनी कामनाओं को पूर्ण करने के लिए, वे बारी-बारी से

    उस परम कर्म तक पहुँचते हैं, उस संपूर्ण परम आनंद तक—

    कभी प्याला या अधर और कभी पात्र बनकर—

    रात्रि की भाँति विह्वल, दिवस की भाँति दीप्त और उत्कट।

     

    उनकी प्रेम-क्रीड़ाएँ वृहत और उल्लासपूर्ण हैं;

    न वे मूर्छाएँ, न वे स्नायविक व्याकुलताएँ

    बल्कि साहसी क्रीड़ाएँ और फिर

    गर्दन के चारों ओर ढली हुई सुख-संतृप्त बाँहें

    दो जनों की घनिष्ठ नींदें, जो बार-बार टूटती और फिर जुड़ जाती हैं।

     

    सोओ, हे प्रेमियो! जबकि तुम्हारे चारों ओर

    यह संसार, जो कोमल और सूक्ष्म बातों के प्रति असावधान है

    या तो शोर मचाता है या दुष्ट तंद्राओं में पड़ा रहता है

    और इतना मूढ़ कि तुमसे ईर्ष्या तक नहीं करता।

     

    और फिर वे उजले, निर्मल, प्रफुल्ल जागरण-क्षण

    मानो किसी और भी अधिक भव्य उत्सव की ओर बढ़ते गर्वित अभिशप्तों के!

    और प्रणाम तुम्हें, आत्मा के निर्मल साक्षियों

    इस संघर्ष में—

    जड़ प्रकृति के बंधनों से मुक्ति के लिए!

    ***

    स्रोत :
    • रचनाकार : पॉल वेरलेन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित

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