Font by Mehr Nastaliq Web

आब धोधि पर ताला लागत

aab dhodhi par tala lagat

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

आब धोधि पर ताला लागत

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    कविजी!

    आन बात बरु कम लिखियौ

    देश दशा दुर्गम लिखियौ।

    भुस्सा कऽ दए सय कैंसर के

    तेहन कोनो मलहम लीखियौ॥

    (चित्र एक)

    सन्दर्भ :

    यउ, नेता छी तँ सबसँ पहिने ठोर ने कौखन सीबी

    गंगाजल बादहुमे, पहिने लाज घोंटि कऽ पीबी

    पर्यावरण प्रदूषण तञे ने हरित-क्रान्ति अछि पसरल

    हरित-क्रान्तिमे सबसँ बेसी हरिअर रहओ गरीबी!!

    यउ, खटनिहार बेदम लीखियौ

    बटनिहार बम-बम लीखियौ

    आब धोधिपर ताला लागत

    से पाँती दन-दन लीखियौ॥

    (चित्र दू)

    सन्दर्भ :

    डाक्टर साहेब, हम बड़ी कालसँ गौर करै छी

    अहाँ श्मशानमे मुँह झाँपि कऽ किए चलै छी?

    डाक्टर छला ईमानदार, कहलनि बड़ा सफाइसँ

    एतऽ जते गोटा मुइला, सब हमरे दवाइसँ!!

    तँ अस्पताल ढन-ढन लीखियौ

    डाक्टर सब टन–टन लीखियौ

    मुदा आब चलत ने बेसी

    जागि रहल जन-जन लीखियौ॥

    (चित्र तीन)

    सन्दर्भ :

    आब तँ

    जलहु होइछ निपात, तखन तँ जीबितहिं हएत सराध

    जंगल सब कटि गेल, तेँ आयल बीच गाममे बाघ

    हम बूढ़, हमरहिसँ बाघक सोझा-सोझी भेल,

    आब करब की बाप? सुखाकऽ प्राण कण्ठ तर गेल।

    'महाराज, हमर तँ सर्द ठण्ढ़ा खून

    अहाँ अनेरे किए लगायब चून?

    कहै छी...

    फेरो कहुना कऽर जोड़ि कऽ

    विनय कएल घिघिआ कऽ;

    कोनो जवानक गर्म खून

    सरकार पीबू सरिया कऽ।'

    बघवा बाजल—

    'तोहूँ बुढ़बा घाघ, मोन छौ तोरो जीबक

    हमहूँ बोनक बाघ, 'मूड' अछि ठण्ढा पीबक॥'

    कविजी!

    रौद बढ़य छन-छन लीखियौ

    चानि जरय चन-चन लीखियौ

    जँ जंगल अहिना कटायल तँ

    भूतल जल ठन-ठन लीखियौ॥

    (चित्र चारि)

    सन्दर्भ :

    छुच्छ भादवक अलगल भदई,

    सोदर अगबे अरबा मुदई॥

    सोदर अछि, गाम रहैए, दुनू कूरी खाइए

    हम बहरिया, हमरा ले कि? सुखाइए कि फेकाइए?

    मुदा आब नञि!

    सोदरकेँ नहि भाओ हमर तँ हमहीं कत्ते चाहब

    नहि खाय हमर हिस्सा तँ सबटा सासुर साहब

    जखन मुदैया मोट अपन घरहिमे अरबा काएमे

    तखन घाट, बाजार, हाटसँ, दुश्मन किए बेसाहब?

    कविजी!

    (से) अपनासँ अनबन लीखियौ

    अनकासँ 'भरिदम' लीखियौ

    अबल दुबर जँ अछि सोदर तँ

    सितुआ केर 'सन-सन' लीखियौ॥

    (चित्र पाँच)

    सन्दर्भ :

    बिना तर्क के, बिना दृष्टि के,

    निर्दोषक ली जान;

    क्रान्ति बनय व्यापार तँ होइए

    'क्रान्ति' शब्द बदनाम।

    कविजी!

    नेता केर फन-फन लीखियौ

    सरकारे ढन-मन लीखियौ

    क्रान्तिहुमे फेटमाल होइत अछि

    तथ्य होइछ गन-गन लीखियौ॥

    (चित्र छ:)

    यउ!

    अघ संस्कृति धन-धन लीखियौ

    'पब' संस्कृति खन-खन लीखियौ

    घन-घन घूँघरू आब चलत नहि

    कर काता 'हन-हन' लीखियौ!!

    कविजी!

    आन बात बरू कम लीखियौ

    देश दशा दुर्गम लीखियौ

    भुस्सा कऽ दए सय कैंसर के

    तेहन कोनो मलहम लीखियौ।

    मुदा आब चलत ने बेसी

    जागि रहल जन-जन लीखियौ

    आब धोधिपर ताला लागत

    से पाँती दन-दन लीखियौ॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 40)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY