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1964 के वे दिन

1964 ke ve din

अनुवाद : शायक आलोक

जेम्स मेरिल

जेम्स मेरिल

1964 के वे दिन

जेम्स मेरिल

और अधिकजेम्स मेरिल

    मकान कई, एक दूतावास और एक अस्पताल।

    हमारा आस-पड़ोस धूप में सूख रहा था, भले ही 

    रात की बारिश के जमे पानी में अब भी बची हुई थी 

    एक हल्की-सी थरथराहट...

     

    शहर के मध्य तक जाने वाली सड़क के दूसरी ओर 

    कुछ दूर तक साथ निभाती चलती थी एक खड़ी पहाड़ी

    या ऐसी जिसे बीस मिनट में चढ़ा जा सकता था 

    अद्भुत नज़ारों के लिए

    जहाँ छतरीनुमा चीड़ों के बीच  

    शहर और समुंदर दीखते थे।

    पाँवों तले साइक्लेमन और ऑटम क्रोकस के फूल उगे रहते थे

    जो उन अच्छे पलों की यादों के बीच बारीक पसीने की बूँदों की तरह 

    चमक रहे थे जो सबने साथ बिताए थे। भले यह ओलंपस नहीं हो

    फिर भी यह शोर-शराबे से दूर, साल भर चलने वाला पहाड़ी जश्न था।

     

    मैं अपनी चढ़ाइयों के दौरान कुछ फूल तोड़ लाता था।

    किरिया क्लेओ, जो हमारे यहाँ सफ़ाई का काम करती थी

    उन्हें पानी में रख देती और आह भरती—वर्जिन... वर्जिन...

    उसकी टाँगों में दर्द रहता था। वह भूरी पोशाक पहनती थी

    देखने में मोटी थी, उम्र उसकी पचास के पार रही होगी

    और पाल्माइरा की औरत जैसी लगती थी

    जिसे किसी ने चर्बी और घोड़े के बालों से दुबारा गढ़ दिया हो।

    वह कितना प्यार करती थी तुमसे, मुझसे, हम सबसे, चिड़िया से, बिल्ली से!

    अब सोचता हूँ तो लगता है वह प्रेम की मूरत थी

    दिन भर उसी प्रेम से आहें भरती रहती थी और चमकती रहती थी—

    या दर्द से, या शायद दोनों से।

    (हमारे बीच कोई ख़ास बातचीत नहीं होती थी।)

    वह पास ही रहती थी अपनी धार्मिक माँ

    और आवारा बेटे के साथ। वह मुझे अपना असली बेटा कहती थी।

     

    मैं उसे अच्छी पगार देता था, ऐसा कह सकता हूँ।

    प्रेम आदमी को उदार बनाता है। हमें ही देख लो।

    हम एक-दूसरे को इतने थोड़े अरसे से जानते थे

    कि सोने के बजाय पूरी-पूरी रात लैंप की रोशनी में जागे पड़े रहते थे

    एक-दूसरे को देखते हुए या इधर-उधर की बातें करते हुए।

     

    एक घड़ी बार-बार लौटती है याद में—

    तुम मेरी बाँहों में हाँफ रहे थे, प्रेम से या हँसी से या शायद दोनों से

    मुझे अभी ही याद आया था और मैंने तुम्हें बताया था 

    कि उस दुपहर शहर की तरफ़ जाते हुए मैंने क्या देखा था :

    बेचारी बूढ़ी क्लेओ, अपनी दुखती टाँगों के साथ,

    चीड़ों के जंगल की तरफ़ चली जा रही थी। मैंने उसे पुकारा।

    तीन बार पुकारा तब कहीं उसने मुड़कर देखा।

    उसने एक तंग आसमानी रंग की स्वेटर पहन रखी थी और उसका चेहरा

    रंगा हुआ था। हाँ, उसका चेहरा सफ़ेद रंगा किसी विदूषक की तरह,

    दिन के उजाले में चाँद की सफ़ेदी जैसा

    पलकों पर मोती की चमक और होंठ पॉइनसेटिया की पत्ती जैसे सुर्ख़।

    मुझे भोगो, मुझे प्रतिदान दो—कामना का वही मुखौटा

    जिसे माया जगत-भर में पहने फिरती है

    स्वयं और सहज आवश्यकता के परिणय के लिए।

     

    हैरानी और ख़ामोशी में, हम बस देखते रह गए—क्या प्रेम एक भ्रम था?— 

    फिर हम अपने-अपने रास्ते चल दिए।

    कुछ देर बाद मैं एक चौक से गुज़र रहा था

    जहाँ एक चलती-फिरती खुली मंडी लगी थी

    सब्ज़ियाँ, मुर्ग़ियाँ, मिट्टी के बरतन—सब वहाँ मौजूद थे

    मोल-भाव करने वालों की भीड़ के बीच, हर कोई मन ही मन

    शंकित था कि कहीं उसे ठग न लिया जाए, लूट न लिया जाए,

    वह पक्षी, वह फूल—उस नवंबर की कोमल ऋतु का उपहार;

    मुलायम मिट्टी की पगडंडियों पर स्वयं को खोता हुआ,

    या कहीं कोई ठौर पा लेता हुआ;

    जहाँ कली स्पंदित होकर जागती है,

    केवल इसलिए कि और सहजता से तोड़ी जा सके—

    स्वयं कीचड़ में घुटनों के बल झुकी हुई।

    यहीं मैं ठिठक गया हम दोनों की ख़ातिर।

     

    और घर लौटते वक़्त, मन के कुछ शांत होने पर 

    हमारे लिए फल ख़रीद लाया।

     

    अगर तुम यह पढ़ो तो मुझे माफ़ कर देना।

    (और अगर कभी कोई इसे यूनानी में अनुवाद कर 

    किरिया क्लेओ को सुनाए तो वह भी मुझे माफ़ कर दे।)

    मैं बहुत अरसे तक प्रेम से रिक्त रहा था।

     

    मुझे ख़ुद नहीं मालूम था कि मैं क्या सोच रहा हूँ।

     

    जहाँ मैंने अपना चेहरा छिपाया, तुम्हारे स्पर्श ने फ़ौरन रहमदिल होकर

    मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी। एक देवता मेरे होंठों से साँस ले रहा था।

    अगर वह भ्रम था तो मैं चाहता था कि वह बहुत देर तक बना रहे;

    हमारे साथ उसी घर में रहे, अपनी मामूली मज़दूरी पर, सफ़ाई करता हुआ,

    पौधों को पानी देता हुआ, प्रेम या दर्द की आहें भरता हुआ।

    मुझे उम्मीद थी कि ज़रूरत पड़ने पर वह ऊँचाइयों तक चढ़ेगा

    यहाँ तक कि पतन की ऊँचाइयों तक भी जैसे मैं ख़ुद

    उन दिनों बराबर चढ़ता रहता था

    एक ऐसी दुनिया की तरफ़ जहाँ जंगली फूल थे, दावतें थीं, आँसू थे—

    या क्या मैं गिर रहा था? टाँगें जवाब देती हुईं, ऊँचाइयाँ, गहराइयाँ,

    हर रात की बारिश के बाद जमे हुए पानी में?

    मगर तुम हर जगह मेरे साथ थे, एक नक़ाब पहने हुए

    और कौन था जो नक़ाबपोश नहीं था—हँसी में, दर्द में और प्रेम में।

    ***

    स्रोत :
    • रचनाकार : जेम्स मेरिल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित

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