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    सपत बाचा आपुस मो किएउ, प्रान सेंति मिलि गैऊ।

    पुनि आपुस महँ रंग की बाता, कहैं जो लागे जेहि रँग राता।

    पेम रंग जो पुरब के राते, सहज पीरम रस दूनौ माते।

    रतन हिरौंदी जरी बिनानी, कुंअर दीन्ह कुंअरिहिं सहिदानी।

    और कुंअरि कर मुंदरी आही, सो अपने कर पल्लौ बाही।

    क्रीड़ा कोड बिनोद लोभाने, बिबि जिय पेम समान।

    कबहिं रहसि जिउ हुलसहिं, कबहीं हरहिं गियान॥

    पेम भाव दुऔ जो भरेऊ, परम अनंद चित्त में धरेऊ।

    कबहिं अलिंगन जे हंसि देई, कबहिं कटाछ जीव जो लेई।

    कबहूँ भौंह बान हनि मारै, कबहूँ अमी बचन अनुसारै।

    कबहीं सीस चरन सै लावै, कबहीं आपु अपान गँवावै।

    कबहीं नैन जीव हरि लेहीं, कबहीं अधर सुधानिधि देहीं।

    नैन सोहागिनि बिस बसै, अधरन्ह अंब्रित बासु।

    नैन कटाछ जो मारै, बिहँसि जियावै तासु॥

    कबहीं चिहुर लहरि बिस सारे, कबहीं नैन मंत्र पढ़ि मारै।

    कबहिं लीन पेम रस माँहा, कबहीं आपुस मों गलबाँहा।

    कबहिं मान सेंउ प्रीति बढ़ावै. कबहिं सहज रस भाव देखावै।

    कबहीं नैन मिलि रस उपजावै, कबहीं पेम अनंद बढ़ावै।

    कबहीं पेम समुंद हिलोरा, कबहीं आपु मैं प्रीति निहोरा।

    कबहिं पेम मदमाती, गरबहिं दिस्टि लाव।

    कबहिं पेम भाव रस माने, पीतम दासि कहाव॥

    कबहीं पेम घमारि अंडावै, कबहिं सुधारस सींचि जिआवै।

    कबहीं पेम अनंद हुलासा, कबहीं दुनौ बियोग तरासा।

    कबहीं नैन रूप फुलवारी, कबहीं जिउ जोबन बलिहारी।

    कबहीं पेम महारस लेहीं, कबहीं जिउ नेवछावरि देहीं।

    कबहीं लाज समुझि जे भावा, कबहीं रहस हुलास बधावा।

    जो जिव बारि प्रीत सें, कैसेहु राखि जाइ।

    जौं सतभाव सौं मिलै, प्रीति साथ जिउ जाइ॥

    कहत सुनत रस बात सोहाये, लोयन तबहिं नींद भरि आये।

    लुबुधे पेम सबै निसि जागे, भोर होत चखु चारौ लागे।

    पुनि सुरहिनि जो आई तहाँ, गई राखि कुंअर कहँ जहाँ।

    अचरज आइ जो देखै कहा, दीपत पेम जो माथे अहा।

    सुरति भाव देखत उन्ह जाना, दरमरि सेज कुसुम कुंभिलाना।

    कुंअर सेज पर कामिनि, कामिनि सेज कुमार।

    सेज बदलि जे सोये, दुनौं सुरत बिकरारि॥

    मुंदरी दूनौ कर केरी, आपुस महं जो पहिरा फेरी।

    बलया सैन परीं जो फूटी, कंचुकि कसनि उरहिं जो टूटी।

    जो अंग चीर गा भागी, नख रेखा ऊपर कुच लागी।

    उरहीं हार हरावलि टूटि, उधसी माँग बेनि सिर छूटी।

    देखा सैन मलगजी आई, लिलार गा तिलक नसाई।

    कुंअर अधर पर परगट, परी जो काजर लीक।

    नैनन्हि पर सोभित, पान सोहागिनि पीक॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : मधुमालती (पृष्ठ 43)
    • संपादक : शिवगोपाल मिश्र
    • रचनाकार : मंझन
    • प्रकाशन : हिंदी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी
    • संस्करण : 1963

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