बारहमासा (पौष)

मुल्ला दाउद

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    ‘आइ पूस साईं पंथु जोवउं'। खिनु इकु राति दिवसु नहि ‘सोवउं'॥

    सुरिजन केहिं परि सीउ सहारबि'। ‘मरन जाइ जियइ केइं पारबि'॥

    घर घर ‘सउरि सुपेतिई' साजहिं। ‘घिरित' मांस बहु ‘भांतिहि खाजहिं॥

    ‘मइं' तनि चोला चीरु ‘सुहाई'। ‘पिउ' बिनु ‘रोहितास जनु' लाई॥

    ‘जानिउं सिसिर' कंतु सुनि ‘आवत'। राइ ‘रांक घर लइ धनि' रांवत॥

    ‘सुरजन' लोरु बनिजि गा ‘हउं' नित ‘ढारिउं' आंसु।

    ‘कवनु’ ‘लाभ कहं भूलइ' लोरिक पूँजी होइ बिनांसु॥

    मैनां लोरिक की प्रतीक्षा में है। वह सुरजन से कहती है कि पूस गया और मैं जो स्वामी का मार्ग देख रही थी, क्षण भर भी मैं नहीं सोती थी। सुरजन! मैं किस प्रकार शीत को सहन करूँगी? मरा नहीं जा रहा है, किंतु जीना भी कैसे संभव होगा?' घर-घर में लोग सौर-सुपेती (गद्दे-चादरें) सजा रहे थे और घी तथा मांस बहुत भांति से खा रहे थे। किंतु मेरे शरीर पर चोली और चीर भी नहीं सुहाते थे, क्योंकि प्रिय के बिना ऐसा लगता था जैसे आग लगी हुई हो। मैंने समझा कि मेरा कंत शिशिर का आगमन सुनकर जाएगा, क्योंकि इस ऋतु में राजा-रंक सभी अपने घर में स्त्री को लेकर रमण करते हैं। सुरजन, लोरिक वाणिज्य के लिए गया है, और मैं नित्य ही आँसू गिराती रही हूँ। लोरिक! तू किस लाभ के लिए भूल कर रहा है? देख, तेरी पूँजी (स्त्री) का ही इस लाभ के लोभ में विनाश हो रहा है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चांदायन (पृष्ठ 346)
    • रचनाकार : मुल्ला दाउद
    • प्रकाशन : प्रामाणिक प्रकाशन, आगरा
    • संस्करण : 1967

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